दिल्ली हाईकोर्ट की एक खचाखच भरी अदालत में मंगलवार को NEET-UG 2024 से जुड़े विवाद ने नया मोड़ ले लिया। एक मेडिकल छात्र, जिसका भविष्य अचानक अधर में लटक गया था, आखिरकार न्याय की चौखट पर राहत पाता दिखा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि सिर्फ संदेह या जांच के आधार पर किसी छात्र की पढ़ाई छीनी नहीं जा सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता हर्षित अग्रवाल ने 2024 में NEET-UG परीक्षा दी थी। अच्छे अंक और रैंक के आधार पर उन्हें ओडिशा के भिमा भोई मेडिकल कॉलेज में MBBS में दाखिला मिला। पढ़ाई शुरू हो चुकी थी, कक्षाएं चल रही थीं, तभी अचानक हालात बदल गए।
CBI द्वारा NEET-UG 2024 में कथित अनियमितताओं की जांच शुरू हुई। इसी सिलसिले में हर्षित को पूछताछ के लिए बुलाया गया। बाद में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजा और फिर उनका रिजल्ट वापस ले लिया गया। नतीजतन, मेडिकल कॉलेज ने उनका दाखिला भी रद्द कर दिया।
याचिकाकर्ता की दलील
हर्षित की ओर से अदालत को बताया गया कि उन्होंने परीक्षा में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं की। वे जांच में पूरा सहयोग कर रहे हैं और अब तक उनके खिलाफ कोई आपराधिक आरोप भी तय नहीं हुआ है।
उनके वकील ने यह भी कहा कि एक अन्य छात्रा, जिसका नाम भी जांच सूची में था, उसे सुप्रीम कोर्ट से पढ़ाई जारी रखने की अनुमति मिल चुकी है। ऐसे में समान परिस्थितियों में हर्षित के साथ अलग व्यवहार क्यों?
CBI की ओर से अदालत में स्पष्ट किया गया कि जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल कर दी गई है। अहम बात यह रही कि हर्षित को उस चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया गया है। वे केवल एक गवाह हैं।
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NTA और अन्य अधिकारियों का कहना था कि CBI से मिली सूची के आधार पर ही यह कार्रवाई की गई थी।
अदालत की अहम टिप्पणियां
न्यायमूर्ति जस्मीत सिंह ने सुनवाई के दौरान कड़े शब्दों में कहा कि खुली प्रतियोगी परीक्षा पास कर दाखिला पाने वाले छात्र का अधिकार बेहद मूल्यवान है।
अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा,
“जब CBI स्वयं यह कह रही है कि याचिकाकर्ता आरोपी नहीं बल्कि केवल गवाह है, तो उसके खिलाफ किसी भी तरह की प्रथम दृष्टया दोषसिद्धि नहीं मानी जा सकती।”
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि बिना ठोस और ठहराने योग्य कारण के किसी छात्र की पढ़ाई रोकना उसकी शैक्षणिक प्रगति को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
फैसले में यह बात खास तौर पर रेखांकित की गई कि भले ही उच्च शिक्षा को संविधान में स्पष्ट मौलिक अधिकार न कहा गया हो, लेकिन राज्य का दायित्व है कि वह इसे बिना उचित कारण बाधित न करे।
अदालत ने माना कि केवल आरोप या जांच की आंच के आधार पर करियर खत्म करना न्यायसंगत नहीं है।
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अदालत का अंतिम फैसला
सभी दलीलों और तथ्यों पर विचार करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने आदेश दिया कि संबंधित अधिकारी हर्षित अग्रवाल को MBBS की कक्षाएं फिर से जारी रखने दें।
इस निर्देश के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।
Case Title: Harshit Agrawal vs National Testing Agency & Ors.
Case No.: W.P.(C) 12514/2025
Case Type: Writ Petition (Education/Admission)
Decision Date: 07 January 2026
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