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मुकदमे के दौरान खरीदी संपत्ति पर भी अपील खत्म नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलटा

किशोरीलाल (मृत) के कानूनी वारिसों और अन्य बनाम गोपाल और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि एक वारिस की मृत्यु के कारण संपत्ति संबंधी अपील समाप्त नहीं हुई, और 30 साल पुराने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया।

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मुकदमे के दौरान खरीदी संपत्ति पर भी अपील खत्म नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलटा

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम संपत्ति विवाद में स्पष्ट किया है कि यदि मृत पक्षकार के हित पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य कानूनी प्रतिनिधियों द्वारा पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व किए जा रहे हों, तो केवल एक कानूनी वारिस के समय पर प्रतिस्थापन न होने से अपील स्वतः समाप्त (abatement) नहीं मानी जा सकती। अदालत ने इस आधार पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अपील को समाप्त मान लिया गया था।

पृष्ठभूमि: 1992 से चला आ रहा संपत्ति विवाद

यह मामला मूल रूप से वर्ष 1992 के एक दीवानी मुकदमे से जुड़ा है। ग्वालियर निवासी गोपाल ने किशोरीलाल के खिलाफ संपत्ति के संबंध में घोषणा, निषेधाज्ञा और बाद में बिक्री समझौते के विशेष निष्पादन (specific performance) की मांग की थी। मुकदमे के लंबित रहते हुए ही किशोरीलाल ने वही संपत्ति ब्रजमोहन और मनोज को बेच दी। ट्रायल कोर्ट ने 18 अक्टूबर 2000 को गोपाल के पक्ष में डिक्री पारित कर दी।

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इसके खिलाफ किशोरीलाल और बाद में संपत्ति खरीदने वाले पक्षों ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील के दौरान किशोरीलाल की मृत्यु हो गई और उनके चार कानूनी वारिस रिकॉर्ड पर लाए गए। बाद में एक वारिस, मुरारीलाल, का भी निधन हो गया।

हाईकोर्ट में विवाद: अपील समाप्त या जारी?

मुरारीलाल के निधन के बाद उनके कानूनी वारिसों को समय पर प्रतिस्थापित नहीं किया गया। इसी आधार पर गोपाल ने दलील दी कि अपील स्वतः समाप्त हो चुकी है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पहले एक आदेश में माना था कि किशोरीलाल के अन्य वारिस और संपत्ति के खरीदार पहले से रिकॉर्ड पर हैं, इसलिए अपील समाप्त नहीं मानी जाएगी। इसके बावजूद, बाद में हाईकोर्ट ने 12 सितंबर 2017 के आदेश से अपील को समाप्त घोषित कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां शामिल थे, ने रिकॉर्ड का विस्तृत अध्ययन करते हुए कहा कि-

“यह देखना आवश्यक है कि मृत पक्षकार के हित क्या पहले से मौजूद पक्षकारों द्वारा पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व किए जा रहे हैं या नहीं। यदि ऐसा है, तो केवल एक वारिस के प्रतिस्थापन में देरी से अपील समाप्त नहीं होती।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपील में किशोरीलाल के तीन अन्य वारिस पहले से मौजूद थे, साथ ही वे खरीदार भी रिकॉर्ड पर थे जिनके पास संपत्ति का अधिकार चला गया था। ऐसे में किशोरीलाल की संपत्ति का प्रतिनिधित्व अधूरा नहीं था।

क्लेरिकल गलती पर भी कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि 2011 में हाईकोर्ट द्वारा किशोरीलाल का नाम हटाने का निर्देश एक “टाइपिंग या क्लेरिकल त्रुटि” था, क्योंकि उस समय किशोरीलाल पहले ही दिवंगत हो चुके थे और उनका स्थान उनके वारिस ले चुके थे।

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पीठ ने कहा कि ऐसी त्रुटियों का लाभ लेकर किसी पक्ष को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 12 सितंबर 2017 के दोनों आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि अपील को समाप्त मानना कानूनन गलत था। अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों प्रथम अपीलें बहाल की जाएं और हाईकोर्ट अब उन्हें कानून के अनुसार मेरिट पर तय करे।

“अपील समाप्त नहीं हुई थी, इसलिए हाईकोर्ट का विपरीत निष्कर्ष टिकाऊ नहीं है,” पीठ ने निर्णय में कहा।

Case Title:- Kishorilal (Dead) Through LRs & Ors. vs Gopal & Ors.

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