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नौकरी आवेदन में आपराधिक मामले छिपाना पड़ा महंगा: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार की अपील मंजूर की

उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य बनाम दिनेश कुमार - सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि उत्तर प्रदेश सरकार की भर्ती के दौरान लंबित आपराधिक मामलों को छिपाना, बाद में बरी होने के बावजूद नियुक्ति रद्द करने का औचित्य साबित करता है।

Vivek G.
नौकरी आवेदन में आपराधिक मामले छिपाना पड़ा महंगा: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार की अपील मंजूर की

सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते समय सही और पूरी जानकारी देना सिर्फ औपचारिकता नहीं है। इसी बात को दोहराते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने एक अभ्यर्थी की नियुक्ति रद्द करने के फैसले को सही ठहराया, जिसने चयन प्रक्रिया के दौरान अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उत्तर प्रदेश राज्य और अभ्यर्थी दिनेश कुमार के बीच का है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने 2021 में समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की थी। दिनेश कुमार का चयन हुआ और उनसे सत्यापन व शपथ-पत्र (attestation और verification forms) भरवाए गए।

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दोनों ही फॉर्म में, उन्होंने अपने खिलाफ किसी आपराधिक मामले के लंबित होने से संबंधित प्रश्नों का उत्तर "नहीं" में दिया। हालांकि, पुलिस सत्यापन में बाद में दो लंबित मामले सामने आए - एक दंगा और मारपीट से संबंधित, और दूसरा पीछा करने संबंधी प्रावधानों और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम के तहत।

हालांकि बाद में जिला मजिस्ट्रेट ने उन्हें उपयुक्त पाया और कुमार ने स्वयं हलफनामा दाखिल कर मामलों का खुलासा किया, फिर भी राज्य सरकार ने उनकी नियुक्ति रद्द कर दी। इस रद्द करने के फैसले को एकल न्यायाधीश ने पलट दिया, जिसे बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने बरकरार रखा, जिसके बाद राज्य ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले से असहमति जताई। पीठ न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह ने साफ कहा,

“सरकारी सेवा में ईमानदारी और पारदर्शिता सबसे बुनियादी गुण हैं। आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाना चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है।”

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अभ्यर्थी ने एक नहीं, बल्कि दो बार गलत जानकारी दी। यह गलती नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया छिपाव है।

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कोर्ट ने Avtar Singh v Union of India जैसे पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हर मामले में रियायत नहीं दी जा सकती। “कानून कठोर लग सकता है, लेकिन कानून वही रहता है,” पीठ ने टिप्पणी की।

अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील स्वीकार कर ली और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में बरी होना या बाद में सच बताने की कोशिश, प्रारंभिक झूठ को सही नहीं ठहरा सकती।

इस तरह दिनेश कुमार की नियुक्ति रद्द करने का सरकारी फैसला बरकरार रखा गया।

Case Title: State of Uttar Pradesh & Another vs Dinesh Kumar

Case Number: Civil Appeal No. 196 of 2026 (arising out of SLP (C) No. 20292 of 2025)

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