कर्नाटक हाईकोर्ट की कलबुर्गी पीठ ने एक अहम वैवाहिक विवाद मामले में फैमिली कोर्ट द्वारा दिया गया तलाक का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल पति के आरोपों के आधार पर “क्रूरता” साबित नहीं मानी जा सकती, खासकर तब जब कोई स्वतंत्र या दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद न हो।
डिवीजन बेंच ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट भेजते हुए पत्नी को अतिरिक्त सबूत पेश करने की अनुमति भी दी।
मामले की पृष्ठभूमि
पति और पत्नी की शादी 16 जून 2002 को बीदर जिले में हुई थी। दोनों के दो बेटे हैं। पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि पत्नी ने उसे छोड़ दिया, उसके साथ अपमानजनक व्यवहार किया और उस पर HIV/AIDS से पीड़ित होने जैसे आरोप लगाए।
पत्नी ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि पति का दूसरी महिला से संबंध था, जिसके कारण उसे अलग रहना पड़ा। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने दहेज में पैसे और मोटरसाइकिल की मांग की थी।
2016 में फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) और 13(1)(ib) के तहत विवाह समाप्त कर दिया था। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
जस्टिस सूरज गोविंदराज और जस्टिस डॉ. चिल्लाकुर सुमलथा की पीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने सबूतों के मूल्यांकन में एक समान मानदंड नहीं अपनाया।
पीठ ने कहा,
“क्रूरता जैसे गंभीर आरोपों को केवल एक पक्ष के बयान के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। कुछ न कुछ सहायक या स्वतंत्र सामग्री आवश्यक होती है।”
अदालत ने यह भी कहा कि पति ने न कोई दस्तावेज पेश किया और न ही किसी स्वतंत्र गवाह को अदालत में बुलाया। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने उसके आरोपों को स्वीकार कर लिया, जबकि पत्नी के आरोपों को सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया गया।
हाईकोर्ट के सामने पत्नी ने अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल किए, जिनमें एक बच्चे के स्कूल रिकॉर्ड का उल्लेख था। उस रिकॉर्ड में बच्चे के पिता के रूप में पति का नाम और मां के रूप में दूसरी महिला का नाम दर्ज होने का दावा किया गया।
पीठ ने कहा कि यदि यह सामग्री सही साबित होती है, तो यह पति के दूसरी महिला के साथ संबंध और साथ रहने की ओर संकेत कर सकती है। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में पत्नी का अलग रहना “डेजर्शन” यानी परित्याग नहीं माना जा सकता।
बेंच ने टिप्पणी की,
“कानून किसी पत्नी को ऐसे पति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता जो विवाह के दौरान किसी अन्य महिला के साथ संबंध में हो।”
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का 5 दिसंबर 2016 का तलाक आदेश रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया। अदालत ने पत्नी द्वारा पेश अतिरिक्त दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति भी दी।
पीठ ने निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों को अतिरिक्त मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पेश करने का पूरा अवसर दे और मामले का निष्पक्ष पुनर्विचार करे। अदालत ने यह भी कहा कि सुनवाई छह महीने के भीतर पूरी करने का प्रयास किया जाए।
Case Details
Case Title: S v. R
Case Number: MFA No. 200082 of 2017
Court: High Court of Karnataka
Judges: Justice Suraj Govindaraj and Justice Chillakur Sumalatha
Decision Date: April 28, 2026











