सुप्रीम कोर्ट ने धनलक्ष्मी बैंक लिमिटेड की उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें बैंक ने कॉर्पोरेट देनदार कंपनी के खिलाफ दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू करने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि यह मामला साधारण वित्तीय ऋण चूक का नहीं बल्कि अनुबंध और संपत्ति हस्तांतरण से जुड़ा विवाद है, जिसकी सुनवाई पहले से ही डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) में चल रही है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने 7 मई 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) का इस्तेमाल केवल वसूली के दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
रिकॉर्ड के अनुसार, एमराल्ड मिनरल एक्सिम प्राइवेट लिमिटेड ने 2011 में कोलकाता स्थित “सिंथेसिस बिजनेस पार्क” में एक व्यावसायिक यूनिट खरीदने के लिए धनलक्ष्मी बैंक से ₹1.50 करोड़ का ऋण लिया था। बैंक, कॉर्पोरेट देनदार, बिल्डर और WBHIDCL के बीच एक चतुष्पक्षीय समझौता हुआ था।
समझौते के तहत बैंक ने ऋण राशि सीधे बिल्डर को जारी की। बाद में कंपनी का खाता NPA घोषित हुआ और बैंक ने DRT में वसूली कार्यवाही शुरू की। DRT ने 2016 में माना कि बैंक का चार्ज अब भी कायम है और बिल्डर को ₹1.50 करोड़ जमा करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद बैंक ने कंपनी के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवेदन दाखिल किया। NCLT ने 2020 में याचिका स्वीकार कर CIRP शुरू कर दिया था, लेकिन NCLAT ने इसे रद्द कर दिया। NCLAT ने कहा था कि बैंक को “फाइनेंशियल क्रेडिटर” नहीं माना जा सकता क्योंकि राशि सीधे कंपनी को नहीं दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IBC का उद्देश्य वास्तविक वित्तीय संकट का समाधान करना है, न कि व्यक्तिगत कर्ज वसूली का माध्यम बनना।
पीठ ने कहा,
“जहां संहिता का उपयोग भुगतान के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से किया जाता है, वहां यह प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।”
अदालत ने चतुष्पक्षीय समझौते की विभिन्न धाराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि बिल्डर की जिम्मेदारियां इस लेन-देन का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। निर्माण, संपत्ति हस्तांतरण और भुगतान की शर्तें आपस में जुड़ी हुई थीं।
कोर्ट ने कहा कि इस पूरे लेन-देन को केवल बैंक और कॉर्पोरेट देनदार के बीच साधारण ऋण व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विवाद मुख्य रूप से अनुबंधीय प्रकृति का है और इसकी उचित सुनवाई DRT में हो रही है। अदालत ने यह भी नोट किया कि DRT के आदेश के तहत जमा की गई राशि अभी भी कार्यवाही का हिस्सा है।
पीठ ने कहा,
“ऐसे मामलों में IBC की अनुमति देना दिवाला प्रक्रिया को दबावपूर्ण रिकवरी तंत्र में बदल देगा, जो स्वीकार्य नहीं है।”
इसी आधार पर अदालत ने NCLAT के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए धनलक्ष्मी बैंक की अपील खारिज कर दी।
Case Details
Case Title: Dhanlaxmi Bank Limited v. Mohammed Javed Sultan & Ors.
Case Number: Civil Appeal No. 7184 of 2022
Judges: Justice Pamidighantam Sri Narasimha and Justice Alok Aradhe
Decision Date: May 7, 2026











