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सुप्रीम कोर्ट ने दुर्गापुर स्टील प्लांट भर्ती मामले में नियुक्ति आदेश को किया रद्द, उम्मीदवार को ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने दुर्गापुर स्टील प्लांट भर्ती मामले में नियुक्ति देने के आदेश रद्द किए, लेकिन लंबे समय से मुकदमा लड़ रहे उम्मीदवार को ₹5 लाख देने का निर्देश दिया। - दुर्गापुर स्टील प्लांट एवं अन्य। बनाम बिधान चंद्र चौधरी और अन्य।

Rajan Prajapati
सुप्रीम कोर्ट ने दुर्गापुर स्टील प्लांट भर्ती मामले में नियुक्ति आदेश को किया रद्द, उम्मीदवार को ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने दुर्गापुर स्टील प्लांट भर्ती विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें उम्मीदवारों को नौकरी देने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर नियुक्ति का दावा नहीं किया जा सकता कि उम्मीदवार को “फेल” घोषित नहीं किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 2007 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा था, जब स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड के दुर्गापुर स्टील प्लांट ने प्लांट अटेंडेंट-कम-जूनियर टेक्नीशियन पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। शुरुआत में 90 पद निकाले गए थे, जिन्हें बाद में बढ़ाकर 200 कर दिया गया।

करीब 52 हजार आवेदन प्राप्त हुए और 29,459 अभ्यर्थियों ने लिखित परीक्षा दी। इसके बाद इंटरव्यू और मेडिकल टेस्ट हुए तथा कुल 194 उम्मीदवारों ने नियुक्ति प्राप्त की।

कुछ उम्मीदवारों ने आरोप लगाया कि चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी क्योंकि लिखित परीक्षा के अंक सार्वजनिक नहीं किए गए। उन्होंने परिणाम और चयन मानदंड उजागर करने की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया।

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने 2018 में कहा था कि भर्ती रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए गए और यह साबित करने वाला कोई दस्तावेज नहीं था कि याचिकाकर्ता परीक्षा में असफल हुए थे। इसके आधार पर ट्रिब्यूनल ने उन्हें नियुक्ति देने का निर्देश दिया था।

बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा।

न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिंह की पीठ ने कहा कि भर्ती नियमों या विज्ञापन में सभी उम्मीदवारों के अंक प्रकाशित करने की कोई बाध्यता नहीं थी।

पीठ ने स्पष्ट कहा,

“केवल इसलिए कि उम्मीदवारों को असफल नहीं दिखाया गया, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वे परीक्षा में सफल थे।”

अदालत ने यह भी माना कि लिखित परीक्षा एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा आयोजित कराई गई थी और रिकॉर्ड संरक्षित रखने की कोई तय समयसीमा नहीं थी। इसलिए रिकॉर्ड उपलब्ध न होना या नष्ट हो जाना अपने आप में चयन प्रक्रिया को अवैध नहीं बनाता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवारों ने अपनी मूल याचिका में नियुक्ति की मांग भी नहीं की थी। साथ ही, वर्ष 2008 में प्लांट अटेंडेंट पद की योग्यता बदल चुकी थी, इसलिए इतने वर्षों बाद नियुक्ति का आदेश देना उचित नहीं होगा।

इसी आधार पर अदालत ने CAT और कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह ध्यान में रखा कि एक उम्मीदवार वर्ष 2008 से लगातार मुकदमा लड़ रहा था। “मामले की विशेष परिस्थितियों” को देखते हुए कोर्ट ने दुर्गापुर स्टील प्लांट को उस उम्मीदवार को दो महीने के भीतर ₹5 लाख देने का निर्देश दिया।

Case Title: Durgapur Steel Plant & Ors. v. Bidhan Chandra Chowdhury & Ors.

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