दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सिर्फ वकील बदल जाने के आधार पर किसी आपराधिक मुकदमे में गवाह को दोबारा जिरह के लिए नहीं बुलाया जा सकता। चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में अदालत ने आरोपी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें शिकायतकर्ता को फिर से गवाही के लिए बुलाने की मांग की गई थी
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष Sh. Vimal Ghai बनाम Sh. M. P. Sharma शीर्षक से आया। शिकायतकर्ता ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत आरोप लगाया कि आरोपी द्वारा दिया गया चेक “पेमेंट स्टॉप्ड बाय ड्रॉअर” टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया।
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आरोपी का कहना था कि उसने कर्ज की रकम किस्तों में चुका दी थी और इसके बदले उसे रसीदें मिली थीं। हालांकि, शिकायतकर्ता ने इन रसीदों पर अपने हस्ताक्षर होने से इनकार किया। ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता की जिरह तीन अलग-अलग तारीखों पर पूरी हो चुकी थी और मामला बचाव पक्ष के साक्ष्य के चरण में था।
आरोपी ने दलील दी कि उसके पहले वकील ने शिकायतकर्ता से जरूरी सवाल नहीं पूछे, जिससे मामले के अहम तथ्य अदालत के सामने नहीं आ सके। नए वकील के आने के बाद यह कमी सामने आई और इसलिए शिकायतकर्ता को फिर से जिरह के लिए बुलाना न्याय के हित में जरूरी है।
आरोपी पक्ष ने यह भी कहा कि “पुराने वकील की गलती की सजा याचिकाकर्ता को नहीं मिलनी चाहिए।”
शिकायतकर्ता की ओर से इसका कड़ा विरोध किया गया। कहा गया कि जिरह पहले ही कई बार हो चुकी है और अब दो साल बाद गवाह को फिर बुलाना सिर्फ मामले में देरी करने की कोशिश है। बचाव पक्ष का यह कदम “खामियां भरने” के बराबर है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।
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न्यायालय की टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रविंदर दुडेजा ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 अदालत को गवाह को बुलाने या दोबारा जिरह कराने का व्यापक अधिकार देती है, लेकिन इसका इस्तेमाल हर बार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने टिप्पणी की,
“केवल वकील बदलने के आधार पर गवाह को दोबारा बुलाने की अनुमति देना न्यायिक प्रक्रिया को अंतहीन बना देगा।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि नए वकील का पुराने वकील से अलग रणनीति अपनाना, गवाह को दोबारा बुलाने का वैध कारण नहीं हो सकता। अगर ऐसा होने लगे, तो हर मुकदमा बार-बार उसी चरण में लौटता रहेगा।
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हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि निष्पक्ष सुनवाई सिर्फ आरोपी का ही नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता और समाज का भी अधिकार है। “निष्पक्षता के नाम पर न्याय व्यवस्था को बंधक नहीं बनाया जा सकता,” अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा।
निर्णय
सभी दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि आरोपी को पहले ही पर्याप्त अवसर मिल चुके थे और अब गवाह को फिर से बुलाने की कोई ठोस वजह नहीं है।
अंततः, याचिका को merit से रहित बताते हुए खारिज कर दिया गया
Case Title:- Sh. Vimal Ghai vs Sh. M. P. Sharma
Case Number: CRL.M.C. 4782/2024
Date of Decision: 5 January 2026










