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सेवा शुल्क वसूली केस में तीसरे पक्ष की एंट्री से इनकार, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा

एनएके इंजीनियरिंग कंपनी प्रा. लिमिटेड बनाम तरूण केशरीचंद शाह एवं अन्य। सेवा शुल्क वसूली विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा-जिसके खिलाफ सीधी राहत नहीं, उसे जबरन प्रतिवादी नहीं बनाया जा सकता।

Vivek G.
सेवा शुल्क वसूली केस में तीसरे पक्ष की एंट्री से इनकार, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा

सेवा शुल्क की वसूली से जुड़े एक पुराने सिविल विवाद में Supreme Court of India ने साफ कहा है कि जिस व्यक्ति या कंपनी के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष राहत नहीं मांगी गई हो, उसे जबरन मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें एक निजी कंपनी को सिविल सूट में प्रतिवादी बनाए जाने से मना कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला मुंबई स्थित चर्चगेट हाउस की एक व्यावसायिक संपत्ति से जुड़ा है। संपत्ति के मूल मालिक के निधन के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने फर्नीचर और फिक्स्चर के उपयोग के लिए सेवा शुल्क की वसूली हेतु सिविल सूट दायर किया था। यह दावा उस फर्म के खिलाफ था, जिसे पहले से सब-टेनेंट के रूप में जगह उपयोग करने की अनुमति मिली हुई थी।

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समय के साथ यह सूट सिटी सिविल कोर्ट में स्थानांतरित हुआ। मूल प्रतिवादी की ओर से कोई प्रभावी पैरवी नहीं हुई और मामला एक समय पर एकतरफा (ex-parte) चलने लगा।

काफी वर्षों बाद एक निजी लिमिटेड कंपनी ने अदालत में आवेदन देकर खुद को मुकदमे में प्रतिवादी बनाने की मांग की। कंपनी का तर्क था कि वह मूल फर्म की उत्तराधिकारी (successor) है और वही वर्तमान में परिसर का उपयोग कर रही है, इसलिए सेवा शुल्क विवाद में उसका पक्ष सुना जाना चाहिए।

ट्रायल कोर्ट ने इस दलील को प्रारंभिक तौर पर स्वीकार करते हुए कंपनी को प्रतिवादी बनाने की अनुमति दे दी थी।

हाईकोर्ट का हस्तक्षेप

हालांकि, हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। हाईकोर्ट का कहना था कि सेवा शुल्क की वसूली का विवाद मूल प्रतिवादी और संपत्ति मालिकों के बीच है।

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कंपनी के खिलाफ कोई सीधी राहत नहीं मांगी गई है, इसलिए वह न तो आवश्यक पक्ष (necessary party) है और न ही उचित पक्ष (proper party)

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

“आवश्यक पक्ष वही होता है, जिसके बिना प्रभावी आदेश पारित नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि सिर्फ यह दावा कर देना कि कोई कंपनी उत्तराधिकारी है, अपने आप में पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ठोस कानूनी प्रमाण आवश्यक हैं। अदालत ने पाया कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि मूल फर्म का विधिवत रूपांतरण या विलय हुआ था।

पीठ ने इस तथ्य को भी अहम माना कि संबंधित कंपनी को मुकदमे की जानकारी कई साल पहले मिल चुकी थी, इसके बावजूद उसने लगभग नौ वर्षों बाद, वह भी साक्ष्य बंद होने के बाद, खुद को पक्षकार बनाने की अर्जी दी। कोर्ट के अनुसार इतनी देरी अपने आप में आवेदन को कमजोर बनाती है।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि मुकदमा दायर करने वाला पक्ष ही यह तय करता है कि वह किसके खिलाफ राहत चाहता है।

यदि वादी किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कोई दावा नहीं करना चाहता, तो अदालत उसे जबरन प्रतिवादी नहीं बना सकती।

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अंतिम निर्णय

इन सभी कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि इस सूट में पारित कोई भी डिक्री संबंधित कंपनी के खिलाफ लागू नहीं की जाएगी।

Case Title: NAK Engineering Company Pvt. Ltd. v. Tarun Keshrichand Shah & Ors.

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) Nos. 6024–6025 of 2022

Case Type: Civil – Impleadment / Service Charges Recovery

Decision Date: 5 January 2026

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