नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने श्रमिक मुआवज़ा विवाद में अहम हस्तक्षेप करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कर्मचारी की मृत्यु ड्यूटी के दौरान होती है और रोजगार का संबंध साबित है, तो मुआवज़े से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह फैसला भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने सुनाया, जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2004 का है। मृतक पंगंती सुरेश, उत्तर प्रदेश के निज़ामाबाद क्षेत्र में एक वाहन मालिक के यहाँ ड्राइवर के रूप में कार्यरत थे। उनका मासिक वेतन ₹3,500 था।
10 सितंबर 2004 की सुबह करीब 5:30 बजे, हैदराबाद से लौटते समय उनकी कार की आमने-सामने से आ रही एक लॉरी से टक्कर हो गई। हादसे में कार सवार चार लोगों में से दो की मौत हो गई, जिनमें सुरेश भी शामिल थे।
इसके बाद उनकी पत्नी ने वर्कमेन मुआवज़ा अधिनियम, 1923 के तहत दावा दायर किया और कहा कि दुर्घटना “रोज़गार के दौरान और उसी के कारण” हुई थी।
कमिश्नर का फैसला और हाईकोर्ट की दखल
मजदूर मुआवज़ा आयुक्त ने उपलब्ध मौखिक और दस्तावेज़ी साक्ष्यों के आधार पर यह माना कि सुरेश वाहन मालिक के कर्मचारी थे और हादसा ड्यूटी के दौरान हुआ।
आयुक्त ने वाहन मालिक और United India Insurance Company पर संयुक्त रूप से ₹3,73,747 का मुआवज़ा 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित देने का आदेश दिया।
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हालाँकि, हैदराबाद में तेलंगाना राज्य के लिए उच्च न्यायालय में बीमा कंपनी की अपील ने इस आदेश को पलट दिया। उच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि मृतक और वाहन मालिक के बीच नेपोलियन-कर्मचारी के बीच संबंध सिद्ध नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इस सोच को “गलत और रिकॉर्ड के विपरीत” बताया। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने वाहन मालिक के शुरुआती इनकार पर अत्यधिक भरोसा किया, जबकि बाद में उसी मालिक ने जिरह और पुनः जिरह में रोजगार संबंध स्वीकार किया था।
अदालत ने यह भी नोट किया कि वाहन मालिक ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में साफ तौर पर माना कि सुरेश उसके कर्मचारी थे और पहले किया गया इनकार केवल “नागरिक दायित्व से बचने” के लिए था।
पीठ ने कहा,
“मुआवज़ा आयुक्त का निष्कर्ष साक्ष्यों के सही मूल्यांकन पर आधारित था और उसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं थी।”
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए मुआवज़ा आयुक्त का आदेश बहाल कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि सुरेश की मृत्यु रोजगार के दौरान और उसी से जुड़ी परिस्थितियों में हुई थी।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मुआवज़े की राशि और ब्याज पहले ही हाईकोर्ट में जमा है, जिसमें से एक-तिहाई रकम दावेदार निकाल चुकी हैं। शेष राशि चार सप्ताह के भीतर जारी करने का निर्देश दिया गया।
Case Title:- Panganti Vijaya vs United India Insurance Company Ltd. & Others
Case Number: Civil Appeal of 2026 (Arising out of SLP (C) No. 15218 of 2024)









