नई दिल्ली में सोमवार को भारत के सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना पीठ के सामने एक असामान्य लेकिन व्यावहारिक विवाद आया। मामला उस रकम से जुड़ा था, जो अदालत के पहले के आदेश के बावजूद याचिकाकर्ता को पूरी तरह नहीं मिल पाई थी। सुनवाई के बाद अदालत ने साफ निर्देश दिया कि गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर की राशि याचिकाकर्ता को लौटाई जाए।
यह फैसला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता धर्मेंद्र शर्मा ने पहले आगरा विकास प्राधिकरण (ADA) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। सितंबर 2024 में अदालत ने उस अपील का निपटारा करते हुए ADA को निर्देश दिया था कि वह:
- याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई पूरी राशि 9% वार्षिक ब्याज सहित लौटाए
- अतिरिक्त ₹15 लाख का मुआवज़ा अदा करे
- और ₹3,99,100 मूल्य के गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर लौटाए
ADA ने ब्याज सहित रकम और मुआवज़ा तो चुका दिया, लेकिन स्टाम्प राशि को लेकर विवाद बना रहा।
स्टाम्प पेपर को लेकर विवाद
याचिकाकर्ता का आरोप था कि स्टाम्प पेपर की राशि लौटाने के बजाय ADA ने दिसंबर 2024 में वे स्टाम्प पेपर डाक से भेज दिए, जो तब तक समाप्त (expired) हो चुके थे। इसके बाद याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश के स्टाम्प एवं पंजीकरण विभाग से राशि वापसी की मांग की।
हालांकि, जुलाई 2025 में विभाग ने यह कहते हुए अनुरोध खारिज कर दिया कि नियमों के अनुसार आठ साल से पुराने भौतिक स्टाम्प पेपर की राशि वापस नहीं की जा सकती।
अदालत की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दायर हलफनामे में स्वीकार किया गया कि विभाग ने नियमों की ईमानदार व्याख्या के आधार पर फैसला लिया था। साथ ही, राज्य ने बिना शर्त माफी भी मांगी और कहा कि वह अदालत के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य है।
पीठ ने कहा कि वह नए विवादों के गुण-दोष में जाए बिना इस अवमानना याचिका का समाधान करना चाहती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय के हित में राशि का भुगतान आवश्यक है।
अंतिम निर्णय
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को ₹3,99,100 की राशि दो महीने के भीतर लौटाए, बशर्ते याचिकाकर्ता ADA से प्राप्त गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर वापस करे।
इसके साथ ही, ADA के खिलाफ दायर अवमानना कार्यवाही को बंद कर दिया गया और सभी लंबित अर्ज़ियों का निपटारा कर दिया गया।
Case Title: Dharmendra Sharma v. M. Arunmozhi & Another
Case Number: Contempt Petition (C) Nos. 703–704 of 2025










