इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सख़्त और असाधारण आदेश में प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रियाओं के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि एक महिला और उसके तीन नाबालिग बच्चों को संयुक्त पारिवारिक मकान से जिस तरह बेदखल किया गया, वह कानून के शासन पर सीधा हमला है। कोर्ट ने 48 घंटे में कब्ज़ा बहाल करने, ₹1 लाख मुआवज़ा देने और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता स्मt. सोनी का कहना था कि वह अपने तीन छोटे बच्चों के साथ पैतृक, संयुक्त आवासीय मकान में रहती हैं। उसी मकान के एक हिस्से में वह ब्यूटी पार्लर चलाकर परिवार का गुज़ारा करती थीं। आरोप था कि परिवार के कुछ सदस्यों से एक व्यक्ति ने बिना किसी विधिवत बंटवारे के, कथित बिक्री विलेख के आधार पर मकान के एक हिस्से पर दावा किया।
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जब विवाद बढ़ा तो उस व्यक्ति ने सिविल कोर्ट में स्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) की याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्हें न तो मुकदमे की जानकारी थी और न ही किसी आदेश की। इसके बावजूद, राजस्व और पुलिस की संयुक्त टीम ने भारी बल के साथ पहुंचकर महिला और बच्चों को बाहर निकाल दिया, दुकान का सामान सड़क पर फेंक दिया और परिसर पर ताला लगवा दिया।
कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
डिवीजन बेंच, जिसमें मनोज कुमार गुप्ता एवं अरुण कुमार शामिल थे, ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि पूरा घटनाक्रम “कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” है।
बेंच ने स्पष्ट किया कि:
- बिना सुनवाई और बिना कब्ज़े की प्राथमिक जांच के, एकतरफा अंतरिम आदेश पारित करना गंभीर त्रुटि है।
- निषेधाज्ञा का आदेश केवल रोक लगाने वाला होता है, उससे किसी को नया कब्ज़ा दिलाने का अधिकार नहीं बनता।
- प्रशासनिक अधिकारियों को सिविल विवाद में इस तरह हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं था।
अदालत ने टिप्पणी की,
“जिस तेजी और तरीके से आदेश पारित हुए और लागू किए गए, उससे निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।”
प्रशासन और निचली अदालत पर सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया। न तो प्रतिवादियों को सुना गया और न ही यह दर्ज किया गया कि कथित खरीदार वास्तव में कभी कब्ज़े में था या नहीं।
इसके साथ ही, पुलिस और राजस्व अधिकारियों द्वारा संयुक्त टीम बनाकर महिला को बेदखल करना “अधिकार क्षेत्र से बाहर” बताया गया। कोर्ट ने माना कि यह सब एक निषेधाज्ञा आदेश के नाम पर किया गया, जबकि ऐसा करने का कोई स्पष्ट न्यायिक निर्देश मौजूद नहीं था।
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अदालत का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए ये स्पष्ट निर्देश दिए:
- 48 घंटे के भीतर याचिकाकर्ता और अन्य सह-स्वामियों को मकान का कब्ज़ा लौटाया जाए।
- याचिकाकर्ता को ₹1,00,000 का मुआवज़ा दिया जाए, जो अवैध बेदखली और मानसिक पीड़ा के लिए होगा।
- संबंधित सिविल जज के आचरण पर अनुशासनात्मक जांच पर विचार के लिए आदेश मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए।
- मामले में शामिल जिला न्यायालय कर्मचारी के खिलाफ भी सक्षम प्राधिकारी द्वारा कार्रवाई पर विचार किया जाए।
अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि कानून के नाम पर किसी महिला और उसके बच्चों को इस तरह बेघर करना स्वीकार्य नहीं है।
Case Title: Smt. Soni vs State of Uttar Pradesh & Others
Case Number: Writ – C No. 28263 of 2025










