जयपुर बेंच में गुरुवार को एक अहम सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ कहा कि बुजुर्गों की देखभाल केवल नीति का सवाल नहीं, बल्कि संविधानिक जिम्मेदारी है।
मामला लोक उत्थान संस्थान बनाम राज्य सरकार से जुड़ा है, जिसमें राज्य के वृद्धाश्रमों की स्थिति पर सवाल उठाए गए थे।
डॉ. जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक जीवन देना राज्य का दायित्व है।
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मामले की पृष्ठभूमि
याचिका में कहा गया था कि Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 के तहत हर जिले में जरूरतमंद बुजुर्गों के लिए उचित सुविधाओं वाले वृद्धाश्रम स्थापित किए जाने चाहिए।
कोर्ट के समक्ष राज्य की ओर से बताया गया कि राजस्थान में फिलहाल 31 वृद्धाश्रम संचालित हो रहे हैं। इनकी सूची भी अदालत में पेश की गई।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस पूरे मुद्दे को केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि व्यापक संवैधानिक और सामाजिक संदर्भ में देखा।
अदालत की संवैधानिक टिप्पणी
खंडपीठ ने अपने आदेश में भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव” जैसी धारणाएं हमारी संस्कृति की नींव रही हैं।
अदालत ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन देने की बात करती है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी इसमें शामिल है।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा,“वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण केवल सरकारी नीति का विषय नहीं, बल्कि यह निरंतर संवैधानिक चिंता का विषय है।”
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अदालत ने अनुच्छेद 41, 46 और 47 का भी उल्लेख किया, जिनमें वृद्धावस्था में सहायता और कमजोर वर्गों की सुरक्षा की बात कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का भी जिक्र किया।
विशेष रूप से Ashwani Kumar बनाम Union of India (2019) और Urmila Dixit बनाम Sunil Sharan Dixit (2025) के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि 2007 का कानून एक कल्याणकारी कानून है और इसकी व्याख्या उदार और उद्देश्यपूर्ण तरीके से की जानी चाहिए।
पीठ ने कहा,“कानून केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर वास्तविक सुरक्षा और सुविधा के रूप में दिखना चाहिए।”
बढ़ती बुजुर्ग आबादी पर चिंता
अदालत ने देश में तेजी से बढ़ती वृद्ध आबादी पर भी टिप्पणी की। आदेश में उल्लेख किया गया कि आने वाले वर्षों में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या काफी बढ़ेगी और कई बुजुर्गों को स्वास्थ्य, आश्रय और सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता होगी।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे में वृद्धाश्रमों की स्थापना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि वहां पर्याप्त चिकित्सा सुविधा, आधारभूत ढांचा और आर्थिक सहायता उपलब्ध है या नहीं।
राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया कि फिलहाल 31 वृद्धाश्रम संचालित हो रहे हैं।
इनमें से कुछ सरकारी भवनों में चल रहे हैं, जबकि कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा संचालित हैं।
कोर्ट ने माना कि इन संस्थानों का अस्तित्व एक सकारात्मक कदम है, लेकिन यह भी कहा कि उनकी वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
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अदालत का आदेश
सुनवाई के अंत में अदालत ने राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (Rajasthan State Legal Services Authority) को निर्देश दिया कि वह 15 फरवरी 2026 तक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करे।
रिपोर्ट में प्रत्येक वृद्धाश्रम के बारे में निम्न जानकारी मांगी गई है:
- क्या भवन राज्य सरकार द्वारा निर्मित है?
- क्या वहां रहने वाले लोग वास्तव में वरिष्ठ नागरिक हैं?
- क्या पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है?
- क्या सरकार से कोई वित्तीय सहायता या अनुदान मिल रहा है?
- अन्य कोई मुद्दा जो कल्याण और बुनियादी ढांचे से जुड़ा हो।
अदालत ने कहा कि यह अभ्यास “विधायी मंशा को मजबूत करने और बुजुर्गों के कल्याण को सुनिश्चित करने” के लिए आवश्यक है।
मामले को आठ सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।
Case Title: Lok Utthan Sansthan vs State of Rajasthan
Case No.: D.B. Civil Writ Petition No. 18092/2023
Decision Date: 29 January 2026










