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दिल्ली आबकारी नीति केस में 23 आरोपियों पर आरोप तय करने का आदेश, राउज एवेन्यू कोर्ट का विस्तृत फैसला

सीबीआई बनाम कुलदीप सिंह और अन्य, दिल्ली आबकारी नीति केस में राउज एवेन्यू कोर्ट ने 23 आरोपियों पर आरोप तय करने का आदेश दिया। CBI के आरोपों पर विस्तृत फैसला।

Vivek G.
दिल्ली आबकारी नीति केस में 23 आरोपियों पर आरोप तय करने का आदेश, राउज एवेन्यू कोर्ट का विस्तृत फैसला

दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत में शुक्रवार को बहुचर्चित आबकारी नीति मामले में विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) श्री जितेंद्र सिंह ने आरोप तय करने पर अपना विस्तृत आदेश सुनाया। यह मामला CBI बनाम कुलदीप सिंह एवं अन्य के नाम से दर्ज है और इसमें कुल 23 आरोपी शामिल हैं।

करीब साढ़े पांच सौ पन्नों के आदेश में अदालत ने CBI द्वारा दायर मुख्य आरोपपत्र और चार पूरक आरोपपत्रों पर विस्तार से चर्चा की है। आदेश 12 फरवरी 2026 को सुरक्षित रखा गया था और 27 फरवरी 2026 को सुनाया गया।

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पृष्ठभूमि

CBI का आरोप है कि दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 को तैयार और लागू करते समय कुछ लोकसेवकों और निजी व्यक्तियों ने मिलकर आपराधिक साजिश रची। एजेंसी का कहना है कि नीति में ऐसे बदलाव किए गए जिनसे कुछ चुनिंदा शराब कारोबारियों और तथाकथित “साउथ ग्रुप” को अनुचित लाभ मिला।

आरोपपत्र के अनुसार, थोक मार्जिन 5% से बढ़ाकर 12% किया गया, लाइसेंस पात्रता शर्तों में बदलाव हुआ और खुदरा ज़ोन आवंटन की प्रक्रिया में कथित रूप से हेरफेर किया गया। CBI का दावा है कि इसके बदले भारी रकम “अपफ्रंट मनी” के रूप में ली गई और उसका कुछ हिस्सा गोवा विधानसभा चुनाव 2022 में खर्च किया गया।

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CBI के मुख्य आरोप

एजेंसी का कहना है कि कुछ आरोपियों ने नीति का मसौदा तैयार करने के दौरान जानबूझकर ऐसे प्रावधान जोड़े जो विशेष कंपनियों को फायदा पहुंचाते थे।

CBI ने यह भी आरोप लगाया कि:

  • कुछ बैठकों में 90-100 करोड़ रुपये तक की अवैध धनराशि की बात हुई।
  • हवाला चैनलों के जरिए रकम का लेन-देन किया गया।
  • थोक लाइसेंस और ज़ोन आवंटन में क्रॉस-फंडिंग और कार्टेलाइजेशन के आरोपों को नजरअंदाज किया गया।
  • कुछ डिजिटल साक्ष्य, व्हाट्सएप चैट, बैंक रिकॉर्ड और होटल रजिस्टर एजेंसी ने जब्त किए।

एजेंसी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), 420 (धोखाधड़ी), 201 (साक्ष्य नष्ट करना) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय करने की मांग की।

अपने आदेश में अदालत ने साफ किया कि आरोप तय करने के चरण में विस्तृत साक्ष्य परीक्षण नहीं किया जाता। न्यायालय यह देखता है कि क्या रिकॉर्ड पर ऐसा prima facie (पहली नजर में) सामग्री है जिससे गंभीर संदेह (grave suspicion) बनता है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “सिर्फ शक” और “गंभीर संदेह” में फर्क है। यदि सामग्री केवल अनुमान पर आधारित हो तो आरोप तय नहीं किए जा सकते।

अदालत ने यह भी कहा कि नीति निर्माण से जुड़े मामलों में केवल प्रशासनिक निर्णय या नीति की विफलता को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता, जब तक कि स्पष्ट रूप से भ्रष्ट मंशा या quid pro quo (लेन-देन) का प्रथम दृष्टया आधार न हो।

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नीति बनाम अपराध: कोर्ट की अहम टिप्पणी

आदेश में न्यायाधीश ने लिखा कि सरकार की नीति बनाना उसका कार्यक्षेत्र है। हर नीति प्रयोगात्मक होती है और उसका सफल या असफल होना अपने आप में अपराध नहीं है।

अदालत ने कहा कि:

“आपराधिक कानून का उपयोग प्रशासनिक विवेक की समीक्षा के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि स्पष्ट रूप से भ्रष्ट इरादा या साजिश का प्रथम दृष्टया संकेत न मिले।”

न्यायालय ने यह भी दोहराया कि साजिश साबित करने के लिए ‘agreement’ यानी आपसी सहमति का प्रथम दृष्टया आधार दिखना चाहिए। केवल बाद में हुई व्यावसायिक कमाई या नीति का लाभ मिलना साजिश का प्रमाण नहीं है।

निर्णय

सभी आरोपपत्रों, दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और डिजिटल सामग्री पर विचार करने के बाद अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा सामग्री मौजूद है जिससे कुछ आरोपियों के खिलाफ गंभीर संदेह बनता है।

अदालत ने माना कि इस चरण पर विस्तृत परीक्षण संभव नहीं है, लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड को देखते हुए आरोप तय किए जाने चाहिए ताकि मामला परीक्षण (ट्रायल) के लिए आगे बढ़ सके।

इसके साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि संबंधित धाराओं के तहत आरोप तय किए जाएं और मामले की सुनवाई आगे बढ़े।

Case Title: CBI vs. Kuldeep Singh & Others

Case No.: CBI Case No. 56/2022

Decision Date: 27 February 2026

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