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सुप्रीम कोर्ट ने परिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़े SC/ST Act FIR रद्द की, कहा- घर के भीतर हुआ कथित विवाद ‘पब्लिक व्यू’ में नहीं था

सुप्रीम कोर्ट ने परिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़े SC/ST Act और IPC की धाराओं वाली FIR रद्द करते हुए कहा कि कथित घटना “public view” में नहीं हुई थी। - गुंजन @ गिरिजा कुमारी एवं अन्य। बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) और अन्य।

Rajan Prajapati
सुप्रीम कोर्ट ने परिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़े SC/ST Act FIR रद्द की, कहा- घर के भीतर हुआ कथित विवाद ‘पब्लिक व्यू’ में नहीं था

सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में दर्ज SC/ST Act और IPC की धाराओं वाली FIR को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि शिकायत में यह नहीं दिखता कि कथित जातिसूचक टिप्पणी ‘पब्लिक व्यू’ यानी सार्वजनिक नजर के दायरे में की गई थी, जो इस अपराध के लिए जरूरी शर्त है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला दिल्ली के किर्ती नगर इलाके में दर्ज FIR No. 42/2021 से जुड़ा था। शिकायतकर्ता और आरोपी आपस में परिवार के सदस्य हैं। दोनों पक्षों के बीच पैतृक संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा था।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि 28 जनवरी 2021 को आरोपी पक्ष ने कथित तौर पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और धमकी दी। इसके बाद पुलिस ने SC/ST (Prevention of Atrocities) Act की धाराओं 3(1)(r), 3(1)(s) और IPC की धारा 506/34 के तहत मामला दर्ज किया।

ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय किए थे, जिन्हें दिल्ली हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। इसके खिलाफ आरोपी पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

जस्टिस एन. वी. अंजारिया और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने ने अपने फैसले में कहा कि SC/ST Act के तहत अपराध तभी बनता है जब कथित अपमान या जातिसूचक टिप्पणी “पब्लिक व्यू भीतर कोई भी स्थान” में हुई हो। अदालत ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि केवल निजी स्थान पर घटना होना पर्याप्त नहीं है।

पीठ ने कहा,

“घर के भीतर चारदीवारी में हुई घटना को ‘पब्लिक व्यू’ नहीं माना जा सकता, जब तक वहां स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह मौजूद न हों।”

अदालत ने FIR और चार्जशीट का परीक्षण करते हुए पाया कि कथित घटना आवासीय मकान के भीतर हुई थी और रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट विवरण नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि घटना सार्वजनिक नजर के दायरे में हुई।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जिन दो व्यक्तियों का नाम गवाह के रूप में लिया गया, वे शिकायतकर्ता के मित्र थे और उनके बयान से भी यह स्पष्ट नहीं होता कि उन्होंने कथित घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखा था।

IPC की धारा 506 को लेकर अदालत ने कहा कि शिकायत में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं दिखता जिससे यह माना जाए कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता में “alarm” यानी भय पैदा करने के इरादे से धमकी दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि FIR में SC/ST Act के तहत अपराध के आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं हैं। अदालत ने माना कि आरोप तय करना कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं था।

इसके साथ ही कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के 22 अगस्त 2024 के आदेश, ट्रायल कोर्ट के आरोप तय करने वाले आदेश और FIR No. 42/2021 - तीनों को रद्द कर दिया।

Case Details

Case Title: Gunjan @ Girija Kumari & Ors. v. State (NCT of Delhi) & Anr.

Case Number: Criminal Appeal No. 2446 of 2026 (arising out of SLP (Crl.) No. 9198 of 2025)

Judges: Justice Prashant Kumar Mishra and Justice N.V. Anjaria

Decision Date: May 11, 2026

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