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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: आंध्र प्रदेश के फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर अब IFS पदोन्नति के लिए पात्र

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आंध्र प्रदेश के फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर राज्य वन सेवा का हिस्सा हैं और भारतीय वन सेवा (IFS) में पदोन्नति के पात्र हैं।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा: आंध्र प्रदेश के फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर अब IFS पदोन्नति के लिए पात्र

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आंध्र प्रदेश के फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर (FROs) राज्य वन सेवा (State Forest Service - SFS) का हिस्सा हैं और उन्हें भारतीय वन सेवा (IFS) में पदोन्नति के लिए विचार किया जा सकता है, बशर्ते भर्ती नियमों का पालन किया जाए। यह फैसला 22 अगस्त 2025 को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनाया। इस फैसले ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के पूर्व निर्णय को पलट दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला तब शुरू हुआ जब पी. मरुथी प्रसाद राव, जिन्हें 2006 में फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर नियुक्त किया गया था और 2020 में सहायक वन संरक्षक (ACF) पद पर पदोन्नत किया गया, ने यह मांग रखी कि FROs को राज्य वन सेवा का हिस्सा माना जाए। उनका कहना था कि उन्हें IFS पदोन्नति से बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है, जो समानता और भेदभाव-रहित अवसर की गारंटी देते हैं।

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2022 में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), हैदराबाद ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि FROs को IFS पदोन्नति के लिए SFS का हिस्सा माना जाए। लेकिन आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने दिसंबर 2023 में इस आदेश को पलटते हुए कहा कि FROs भर्ती नियमों के अनुसार SFS में शामिल नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय वन सेवा (भर्ती) नियम, 1966 के नियम 2(ग) के तहत राज्य वन सेवा की परिभाषा में किसी भी ऐसी सेवा को शामिल किया गया है, जो वनों से जुड़ी हो और जिसके सदस्य गजटेड दर्जे वाले हों, बशर्ते केंद्र सरकार राज्य सरकार से परामर्श कर उसे स्वीकृति दे।

अदालत ने नोट किया कि आंध्र प्रदेश वन सेवा नियम, 1997 में सहायक वन संरक्षक (ACF) और फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर (FRO) दोनों को क्लास A गजटेड पदों में शामिल किया गया है। इसलिए, FROs को राज्य वन सेवा का हिस्सा माना जाना चाहिए।

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न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा:

“आंध्र प्रदेश वन सेवा की क्लास A के सदस्य, जिनमें रेंज ऑफिसर भी शामिल हैं, यदि विधिवत नियुक्त किए गए हों तो वे राज्य वन सेवा के सदस्य हैं। परिणामस्वरूप, वे भारतीय वन सेवा में पदोन्नति के पात्र हैं।”

हालांकि अदालत ने कानूनी मान्यता दी, लेकिन अपीलकर्ता को पिछली पदोन्नति प्रक्रियाओं में कोई लाभ नहीं दिया। न्यायाधीशों ने कहा कि राव ने अपनी शिकायत पहली बार जनवरी 2021 में रखी, जबकि वे 2014 में आठ साल की सेवा पूरी कर चुके थे।

पी.एस. सदाशिवस्वामी बनाम तमिलनाडु राज्य (1975) मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि देर से किए गए दावे पहले से तय मामलों को नहीं बिगाड़ सकते।

अदालत ने टिप्पणी की:

“अपीलकर्ता कानूनी मुद्दे में सफल हुए हैं, लेकिन फिलहाल उन्हें पदोन्नति का वास्तविक लाभ नहीं मिल सकता।”

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सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि भविष्य की IFS पदोन्नति प्रक्रिया में FROs को अन्य राज्य वन सेवा अधिकारियों के साथ पात्र माना जाए।

मामले का निपटारा बिना किसी लागत आदेश के किया गया।

मामले का नाम: पी. मारुति प्रसाद राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य

मामले का प्रकार: सिविल अपील (विशेष अनुमति याचिका (सी) संख्या 1253/2024 से उत्पन्न)

निर्णय की तिथि: 22 अगस्त 2025

निर्णय डाउनलोड करें

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