दिल्ली उच्च न्यायालय ने आयकर विभाग द्वारा दायर उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें ट्रांसफर प्राइसिंग से जुड़े एक पुराने विवाद को दोबारा उठाने की कोशिश की गई थी। अदालत ने न केवल मामले के तथ्यों के आधार पर हस्तक्षेप से इनकार किया, बल्कि अपील को दोबारा दाखिल करने में हुई भारी देरी को भी एक स्वतंत्र कारण माना।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला आकलन वर्ष 2010-11 से जुड़ा है। इसमें आयकर विभाग ने M/s TCK Advisers Pvt. Ltd. और उसकी सहयोगी विदेशी इकाई Trikona Advisors Mauritius Limited के बीच हुए अंतरराष्ट्रीय लेन-देन की ट्रांसफर प्राइसिंग पर सवाल उठाया था।
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TCK Advisers केवल अपनी विदेशी सहयोगी कंपनी को निवेश सलाह (Investment Advisory Services) देती थी। यह सेवा कॉस्ट-प्लस मॉडल पर आधारित थी, यानी कंपनी को खर्च पर तय मुनाफा मिलता था और उसे बाजार, क्रेडिट या विदेशी मुद्रा जैसे किसी भी कारोबारी जोखिम का सामना नहीं करना पड़ता था।
हालांकि, ट्रांसफर प्राइसिंग अधिकारी (TPO) ने यह मानते हुए कि सेवाओं की कीमत आर्म्स लेंथ पर नहीं है, करीब ₹3.33 करोड़ की अतिरिक्त आय जोड़ने की सिफारिश की, जिसे आकलन अधिकारी ने स्वीकार कर लिया।
डीआरपी और आईटीएटी का रुख
कंपनी ने इस आदेश को विवाद समाधान पैनल (DRP) के सामने चुनौती दी। डीआरपी ने कंपनी की आपत्तियों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए छह कंपनियों को तुलनात्मक (comparables) सूची से बाहर कर दिया और प्रस्तावित जोड़ को कम करने का निर्देश दिया।
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इसके बाद आयकर विभाग ने आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) का रुख किया। विभाग का तर्क था कि डीआरपी ने गलत तरीके से तुलनात्मक कंपनियों को हटाया है और 75% निर्यात टर्नओवर जैसे फिल्टर मनमाने हैं।
आईटीएटी ने डीआरपी के विस्तृत विश्लेषण से सहमति जताई और विभाग की अपील को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट की टिप्पणियाँ
दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति विनोद कुमार ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि डीआरपी ने प्रत्येक तुलनात्मक कंपनी का कार्यात्मक विश्लेषण किया है।
अदालत ने नोट किया कि जिन छह कंपनियों को बाहर किया गया, वे शेयर ट्रेडिंग, मर्चेंट बैंकिंग, डेट सिंडिकेशन, एनबीएफसी गतिविधियों और पूंजी-आधारित सेवाओं में संलग्न थीं। जबकि TCK Advisers केवल कम-जोखिम वाली, गैर-बाध्यकारी निवेश सलाह देती थी।
पीठ ने कहा,
“डीआरपी द्वारा दिए गए कारण यह स्पष्ट करते हैं कि ये कंपनियाँ कार्यात्मक रूप से assessee से भिन्न थीं।”
अदालत ने 75% निर्यात टर्नओवर फिल्टर को भी सही ठहराया, यह कहते हुए कि assessee की 100% आय निर्यात से थी, जबकि कई तुलनात्मक कंपनियों की निर्यात आय नगण्य या शून्य थी।
देरी पर भी सख्त रुख
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि आयकर विभाग ने अपील को दोबारा दाखिल करने में 1285 दिनों की देरी की, जिसके लिए कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया गया।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि इतनी लंबी और बिना कारण की देरी अपने आप में अपील खारिज करने के लिए पर्याप्त है।
अंतिम निर्णय
इन सभी कारणों के आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर विभाग की अपील को मेरिट और देरी दोनों आधारों पर खारिज कर दिया और डीआरपी व आईटीएटी के आदेशों को बरकरार रखा।
Case Title:- Principal Commissioner of Income Tax–7, Delhi vs M/s TCK Advisers Pvt. Ltd.
Case Number: ITA 778/2025 with CM Appl. 81589/2025










