इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि यदि पुलिस चार्जशीट दाखिल करने के बाद आगे की जांच में ‘फाइनल रिपोर्ट’ लगाती है, तो ट्रायल कोर्ट उसे अनदेखा नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह दोनों रिपोर्टों को साथ पढ़कर ही आगे का फैसला करे।
यह निर्णय जस्टिस अनिल कुमार-एक्स की एकल पीठ ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील Sonu and 5 Others vs State of U.P. and Another मामले में दाखिल की गई थी। अपीलकर्ताओं के खिलाफ वर्ष 2023 में कन्नौज जिले के कोतवाली थाने में आईपीसी की विभिन्न धाराओं और एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी।
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जांच के बाद 15 सितंबर 2023 को पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और 21 दिसंबर 2023 को ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। आगे की जांच के बाद 31 मार्च 2024 को जांच अधिकारी ने एक ‘फाइनल रिपोर्ट’ दाखिल की, जिसमें कहा गया कि आरोप असत्य पाए गए।
इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने इस फाइनल रिपोर्ट पर विचार किए बिना 7 अगस्त 2025 को आरोप तय कर दिए। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं
अपीलकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि जब पुलिस ने आगे की जांच के बाद फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी थी, तो ट्रायल कोर्ट को पहले उस पर आदेश पारित करना चाहिए था।
राज्य की ओर से पेश एजीए ने भी तथ्यों को स्वीकार किया।
कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था-"क्या मजिस्ट्रेट, चार्जशीट पर संज्ञान लेने के बाद दाखिल फाइनल रिपोर्ट पर आदेश देने के लिए बाध्य है?"
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कोर्ट की अहम टिप्पणियां
न्यायालय ने विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के तहत पुलिस को आगे की जांच करने और पूरक रिपोर्ट दाखिल करने का अधिकार है।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पूरक रिपोर्ट को मूल रिपोर्ट का ही हिस्सा माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा, “मजिस्ट्रेट का कर्तव्य सतत (continuing duty) है। वह हर पुलिस रिपोर्ट पर स्वतंत्र रूप से अपना न्यायिक दिमाग लगाए बिना आगे नहीं बढ़ सकता।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मजिस्ट्रेट बाद की रिपोर्ट के आधार पर पहले लिए गए संज्ञान के विपरीत राय बनाता है, तो इसे ‘रिव्यू’ नहीं माना जाएगा।
अदालत ने कहा, “चार्जशीट पर संज्ञान लेने का अर्थ यह नहीं कि बाद में आई फाइनल रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया जाए। दोनों को साथ पढ़कर ही निर्णय होगा।”
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने Supreme Court of India के कई निर्णयों का जिक्र किया, जिनमें Vinay Tyagi vs Irshad Ali और Ram Lal Narang vs State of Delhi शामिल हैं।
इन फैसलों में सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि पूरक रिपोर्ट को प्राथमिक रिपोर्ट के साथ मिलाकर पढ़ना जरूरी है। ट्रायल कोर्ट के पास तीन विकल्प होते हैं-
- आरोपी को डिस्चार्ज करना,
- ट्रायल आगे बढ़ाना,
- आगे की जांच का आदेश देना।
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अदालत का निर्णय
सभी तथ्यों और कानूनी स्थिति पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली।
21 अगस्त 2024, 27 जून 2024 और 10 मई 2024 के आदेशों सहित 7 अगस्त 2025 को आरोप तय करने का आदेश भी रद्द कर दिया गया।
ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह पहले चार्जशीट और फाइनल रिपोर्ट दोनों पर एक साथ विचार करे। यदि संयुक्त रूप से देखने पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तभी आरोप तय किए जाएं।
साथ ही, रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) को आदेश दिया गया कि यह निर्णय प्रदेश की सभी जिला अदालतों को भेजा जाए।
Case Title: Sonu and 5 Others vs State of U.P. and Another
Case No.: Criminal Appeal No. 10405 of 2024
Decision Date: February 13, 2026










