नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि गिरफ्तारी के समय आरोपों की जानकारी पर्याप्त रूप से दे दी जाती है, तो केवल “लिखित रूप” का अभाव गिरफ्तारी को अवैध नहीं बनाता। अदालत ने सीबीआई मामले में आरोपी की याचिका खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला रवि कांत बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से जुड़ा है। सीबीआई ने वर्ष 2023 में एक एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धाराएँ 120-बी (षड्यंत्र), 420 (धोखाधड़ी), 467, 468 और 471 (जालसाजी से संबंधित अपराध) शामिल थीं।
जांच के दौरान रवि कांत को गिरफ्तार किया गया और 9 अक्टूबर 2024 को देहरादून की विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की।
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रवि कांत की ओर से यह मुख्य दलील दी गई कि उनकी गिरफ्तारी संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 का उल्लंघन है।
उनके वकील ने कहा कि:
- गिरफ्तारी के समय “गिरफ्तारी के आधार (grounds of arrest)” लिखित रूप में नहीं दिए गए
- इससे आरोपी अपने बचाव की तैयारी नहीं कर सका
- सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों के अनुसार लिखित सूचना देना आवश्यक है
उन्होंने अदालत से गिरफ्तारी को अवैध घोषित कर तत्काल रिहाई की मांग की।
सीबीआई की ओर से इस दलील का विरोध किया गया। एजेंसी ने कहा कि:
- आरोपी को गिरफ्तारी के समय आरोपों की जानकारी दी गई थी
- आवश्यक दस्तावेज भी उपलब्ध कराए गए
- कानून के तहत सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया
न्यायमूर्ति आशिष नैथानी की एकल पीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद विस्तृत विचार किया।
अदालत ने कहा:
“रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार से अवगत कराया गया था और आवश्यक तथ्यात्मक दस्तावेज उसे उपलब्ध कराए गए थे।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:
- कानून का उद्देश्य केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आरोपी को आरोप समझाना है
- यदि जानकारी प्रभावी रूप से दी गई है, तो प्रक्रिया को दोषपूर्ण नहीं माना जा सकता
हाईकोर्ट ने माना कि:
- अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देना जरूरी है
- लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि क्या आरोपी वास्तव में आरोप समझ पाया या नहीं
अदालत ने पाया कि इस मामले में:
- आरोपी को आरोपों की जानकारी दी गई थी
- दस्तावेज भी प्रदान किए गए
- इसलिए संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन नहीं हुआ
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा:
“गिरफ्तारी में संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन सिद्ध नहीं होता।”
इसके साथ ही कोर्ट ने:
- रिमांड आदेश को वैध माना
- गिरफ्तारी को सही ठहराया
- याचिका को खारिज कर दिया
Case Details
Case Title: Ravi Kant vs Central Bureau of Investigation
Case Number: Criminal Revision No. 945 of 2024
Judge: Justice Ashish Naithani
Decision Date: March 18, 2026











