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विदेश में रहना या बीमारी बहाना नहीं: 1221 दिन की देरी पर हाईकोर्ट ने दूसरी अपील की एंट्री बंद की

एम. मुरलीकृष्णा बनाम मसापल्ली वेंकटरत्नम्मा और अन्य - आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने पारिवारिक संपत्ति विवाद में 1,221 दिनों की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया और सख्त सीमा कानून का हवाला देते हुए दूसरी अपील खारिज कर दी।

Shivam Y.
विदेश में रहना या बीमारी बहाना नहीं: 1221 दिन की देरी पर हाईकोर्ट ने दूसरी अपील की एंट्री बंद की

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक पारिवारिक संपत्ति विवाद में समय-सीमा के उल्लंघन को गंभीरता से लेते हुए 1221 दिनों की देरी से दायर दूसरी अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि बिना ठोस और विश्वसनीय कारण के इतनी लंबी देरी को माफ नहीं किया जा सकता।

यह फैसला न्यायमूर्ति वी. गोपाल कृष्ण राव ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला एम. मुरलीकृष्ण और उनके परिवार से जुड़ा है। विवाद संयुक्त पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे को लेकर था। मुरलीकृष्ण के भाई के कानूनी उत्तराधिकारियों ने वर्ष 2002 में राजमपेट की सीनियर सिविल जज कोर्ट में संपत्ति के बंटवारे के लिए मुकदमा दायर किया था।

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ट्रायल कोर्ट ने 2011 में यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि वादी संपत्ति की सही पहचान और उसे पैतृक संपत्ति साबित करने में असफल रहे। इसके बाद प्रथम अपील दायर की गई, जिसे 2013 में आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एक संपत्ति को बंटवारे योग्य माना गया।

1221 दिन की देरी और दलीलें

प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले के खिलाफ मुरलीकृष्ण ने दूसरी अपील दायर की, लेकिन इसमें 1221 दिनों की देरी हो चुकी थी। देरी माफ कराने के लिए दायर आवेदन में उन्होंने तर्क दिया कि वे वर्ष 2003 से दुबई में रह रहे थे और हाल ही में भारत लौटने पर उन्हें अपीलीय फैसले की जानकारी मिली।

उन्होंने खराब स्वास्थ्य को भी देरी का कारण बताया।

अदालत की अहम टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले भी दुबई से ही वकील के माध्यम से मुकदमा लड़ चुके थे, इसलिए यह कहना कि उन्हें फैसले की जानकारी नहीं थी, विश्वसनीय नहीं है।

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अदालत ने टिप्पणी की,

“देरी माफ करने के लिए केवल बहाना नहीं, बल्कि ठोस और पर्याप्त कारण दिखाना आवश्यक है।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि खराब स्वास्थ्य का दावा करने के समर्थन में कोई मेडिकल रिकॉर्ड या प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

कानून और सीमाबद्धता पर स्पष्ट रुख

फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सीमाबद्धता का कानून सार्वजनिक नीति पर आधारित है। इसका उद्देश्य मुकदमों का अंत सुनिश्चित करना है, न कि उन्हें अनिश्चित काल तक चलने देना।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि,

“न्यायालय सहानुभूति के आधार पर समय-सीमा के कानून को दरकिनार नहीं कर सकता।”

अंतिम निर्णय

सभी तथ्यों और कानून की स्थिति पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने 1221 दिनों की देरी माफ करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही देरी माफी याचिका खारिज कर दी गई और परिणामस्वरूप दूसरी अपील भी अस्वीकार कर दी गई।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि इस मामले से जुड़ी सभी अंतरिम याचिकाएं स्वतः समाप्त मानी जाएंगी।

Case Title: M. Muralikrishna vs Masapalli Venkatarathnamma & Others

Case Number: Second Appeal No. 1488 of 2018

Date of Order: 5 January 2026

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