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7वें वेतन आयोग पर झटका: 2019 से पहले रिटायर डॉक्टरों को 35% NPA नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

डॉ. जयंत दगडू कोटकर बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य; डॉ. राजेंद्र नारायण अहिरराव बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य। बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि 1 जनवरी 2019 से पहले रिटायर मेडिकल अधिकारियों को 35% NPA पेंशन में नहीं मिलेगा। 7वें वेतन आयोग विवाद पर बड़ा निर्णय।

Vivek G.
7वें वेतन आयोग पर झटका: 2019 से पहले रिटायर डॉक्टरों को 35% NPA नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

औरंगाबाद खंडपीठ में मंगलवार को एक अहम फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि 35% नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस (NPA) का लाभ 1 जनवरी 2019 से पहले रिटायर हुए मेडिकल अधिकारियों को नहीं मिलेगा। अदालत ने राज्य सरकार द्वारा तय की गई प्रभावी तारीख में दखल देने से इनकार कर दिया।

यह फैसला दो सेवानिवृत्त डॉक्टरों की याचिकाओं पर आया, जिन्होंने 7वें वेतन आयोग के तहत अपनी पेंशन में 35% NPA जोड़ने की मांग की थी।

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मामला क्या था?

दोनों याचिकाकर्ता-डॉ. जयंता कोटकर और डॉ. राजेंद्र अहीरराव-जिला परिषद के अधीन मेडिकल अधिकारी रहे। वे क्रमशः जून और जुलाई 2018 में सेवानिवृत्त हुए।

राज्य सरकार ने 14 अक्टूबर 2024 के सरकारी निर्णय (GR) के जरिए मेडिकल अधिकारियों को 35% NPA देने का फैसला किया, लेकिन इसे 1 जनवरी 2019 से लागू किया।

डॉक्टरों का तर्क था कि जब 7वां वेतन आयोग 1 जनवरी 2016 से लागू माना गया है, तो NPA भी उसी तारीख से पेंशन में जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि 2019 में रिटायर हुए एक सहकर्मी को यह लाभ मिला है, तो उनसे भेदभाव क्यों?

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि 1 जनवरी 2016 से 7वां वेतन आयोग लागू है। ऐसे में 2016 के बाद रिटायर होने वाले सभी अधिकारी एक ही वर्ग के हैं।

अदालत में यह दलील दी गई कि “कट-ऑफ डेट तय कर राज्य ने समान परिस्थिति वाले कर्मचारियों के साथ भेदभाव किया है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।”

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राज्य सरकार का पक्ष

राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सरकारी वकील ने कहा कि किसी भी वित्तीय लाभ को किस तारीख से लागू करना है, यह पूरी तरह नीति का विषय है।

सरकार का स्पष्ट रुख था कि 14 अक्टूबर 2024 के GR में साफ लिखा है कि 35% NPA केवल 1 जनवरी 2019 से प्रभावी होगा। इसे पिछली तारीख से लागू करने का कोई प्रावधान नहीं है।

सरकार ने पहले के एक फैसले - Dr. M.M. Swami Sirsikar v. State of Maharashtra - का हवाला देते हुए कहा कि वित्तीय कारणों से कट-ऑफ डेट तय करना वैध है।

अदालत की अहम टिप्पणियां

खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत नीति निर्माण का मंच नहीं है।

न्यायमूर्ति हितेन एस. वेनगावकर ने फैसले में लिखा, “याचिकाकर्ता अदालत से सरकारी निर्णय की प्रभावी तारीख बदलने की मांग कर रहे हैं। ऐसा करना नीति में हस्तक्षेप होगा, जो अनुच्छेद 226 के तहत संभव नहीं है।”

अदालत ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई और तारीख “ज्यादा उचित” लगती है, कोर्ट उसे लागू नहीं कर सकती।

पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वित्तीय सीमाएं (financial constraints) कट-ऑफ डेट तय करने का वैध आधार हो सकती हैं।

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क्या 2016 से लाभ अनिवार्य था?

अदालत ने इस धारणा को भी खारिज किया कि 7वें वेतन आयोग की तारीख से सभी भत्ते स्वतः लागू हो जाते हैं।

फैसले में कहा गया, “सरकार वेतन आयोग की सिफारिशें पूरी या आंशिक रूप से, अलग-अलग चरणों में लागू कर सकती है। हर घटक को एक ही तारीख से लागू करना संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है।”

समानता का तर्क क्यों नहीं चला?

अदालत ने माना कि 1 जनवरी 2019 से पहले और बाद में रिटायर होने वाले कर्मचारियों के बीच वर्गीकरण (classification) किया गया है।

लेकिन यह वर्गीकरण मनमाना नहीं है। फैसले में कहा गया, “जब सरकार किसी वित्तीय लाभ के लिए एक प्रभावी तारीख तय करती है, तो उस तारीख के दोनों ओर आने वाले कर्मचारी अलग-अलग वर्ग बन जाते हैं। यह अपने आप में असंवैधानिक नहीं है।”

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अंतिम निर्णय

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि 14 अक्टूबर 2024 के सरकारी निर्णय की धारा (2) असंवैधानिक नहीं है।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को 1 जनवरी 2019 से पहले की अवधि के लिए 35% NPA को पेंशन में जोड़ने का कोई अर्जित या विधिक अधिकार नहीं है।

दोनों रिट याचिकाएं खारिज कर दी गईं। लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।

Case Title: Dr. Jayant Dagdu Kotkar v. State of Maharashtra & Ors.; Dr. Rajendra Narayan Ahirrao v. State of Maharashtra & Ors.

Case No.: Writ Petition No. 56 of 2026 & Writ Petition No. 65 of 2026

Decision Date: 06 January 2026

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