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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 20 साल पुराने सिविल मुकदमे के शीघ्र निस्तारण का निर्देश दिया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2005 से लंबित एक सिविल मुकदमे को शीघ्र निपटाने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने ट्रायल कोर्ट को 18 माह के भीतर मुकदमा निस्तारित करने का आदेश दिया।

Shivam Y.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 20 साल पुराने सिविल मुकदमे के शीघ्र निस्तारण का निर्देश दिया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की पीठ के माध्यम से, इलाहाबाद की न्यायालय छोटे कारण वाद (J.S.C.C.) को यह निर्देश दिया है कि वह एक 2005 से लंबित मुकदमे की सुनवाई और निस्तारण शीघ्रता से करे।

यह मामला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दाखिल एक याचिका के रूप में हाईकोर्ट में लाया गया था। यह याचिका सौघरा बेगम (मृतका) के कानूनी वारिसों द्वारा समीक्षा याचिका के रूप में दाखिल की गई थी, जिसमें स्म्ट. यासमीन बानो एवं 10 अन्य को विपक्षी बनाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट को निर्धारित समयसीमा में मुकदमा निस्तारित करने के निर्देश की मांग की।

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कृष्ण कुमार चौरसिया एवं प्रमोद कुमार कटियार, जो याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता थे, उन्होंने न्यायालय को बताया कि:

“मूल वाद संख्या 412/2005 लगभग दो दशक से लंबित है। विपक्षियों द्वारा लिखित उत्तर (Written Statement) पहले ही दाखिल किया जा चुका है। इसके बावजूद, कई तिथियां निर्धारित होने के बावजूद अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।”

उन्होंने निवेदन किया कि निचली अदालत को बिना किसी और विलंब के मुकदमे का निस्तारण करने का निर्देश दिया जाए।

माननीय न्यायाधीश ने यह टिप्पणी की:

“इस याचिका को लंबित रखने से कोई सार्थक उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा।”

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उन्होंने इस मामले में हो रही अत्यधिक देरी और मुकदमे की लंबी अवधि को ध्यान में रखते हुए, यह सुनिश्चित किया कि न्याय में देरी न हो और पीड़ित पक्ष को शीघ्र राहत मिले।

माननीय न्यायालय ने याचिका का निस्तारण करते हुए, न्यायाधीश, छोटे कारण वाद न्यायालय, इलाहाबाद को यह स्पष्ट निर्देश दिया:

“मूल वाद संख्या 412/2005 (सौघरा बेगम बनाम यासमीन बानो एवं अन्य) का निर्णय कानून के अनुसार यथाशीघ्र, यथासंभव इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से 18 माह के भीतर किया जाए।”

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न्यायालय ने साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि:

  • सभी पक्षकारों को उचित नोटिस और सेवा दी जाए,
  • सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अधिकार दिया जाए,
  • अनावश्यक स्थगन (Adjournments) किसी भी पक्ष को न दिए जाएं,
  • यदि कोई कानूनी बाधा न हो, तो मुकदमा बिना रुकावट निस्तारित किया जाए।

यह आदेश भारत की न्यायिक व्यवस्था में लंबित सिविल मामलों में हो रही देरी को गंभीरता से लेने का प्रमाण है। हाईकोर्ट द्वारा 18 महीने की समयसीमा तय किया जाना यह दर्शाता है कि न्याय समय पर मिलना चाहिए।

केस का शीर्षक: सोगरा बेगम (मृत) और 2 अन्य बनाम श्रीमती यास्मीन बानो और 10 अन्य

केस संख्या: अनुच्छेद 227 के अंतर्गत मामले, संख्या - 7825/2025

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