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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहरेच केस में नाबालिगों की सुरक्षा की, पुलिस को नई आपराधिक प्रक्रिया कानून के तहत अरेश कुमार गाइडलाइन पालन का आदेश

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बहराइच एफआईआर में नाबालिगों को संरक्षण दिया, पुलिस को अर्नेश कुमार और बीएनएसएस दिशानिर्देशों का पालन करने का निर्देश दिया; गिरफ्तारी शक्तियों के दुरुपयोग के खिलाफ चेतावनी दी। - एक लाख अली @ एखलाख और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, सचिव, गृह, लखनऊ और अन्य के माध्यम से

Shivam Y.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहरेच केस में नाबालिगों की सुरक्षा की, पुलिस को नई आपराधिक प्रक्रिया कानून के तहत अरेश कुमार गाइडलाइन पालन का आदेश

न्याय और संवेदना के बीच संतुलन साधते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहरेच पुलिस को

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने यह आदेश 10 अक्टूबर 2025 को क्रिमिनल मिस. रिट याचिका संख्या 9244/2025 में पारित किया, जिसका शीर्षक था एक लाख अली उर्फ़ अखलख बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य।

पृष्ठभूमि

यह मामला 7 सितंबर 2025 को थाना-मोतीपुर, जनपद बहरेच में दर्ज एक एफआईआर से संबंधित था, जिसमें छह व्यक्तियों पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 191(1), 115(2), 352, 351(3) और 324(2) सहित अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे।

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याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता जिया-उर-रहमान ने दलील दी कि लगाए गए आरोप अतिरंजित हैं और अगर इन आरोपों को सतही तौर पर भी स्वीकार किया जाए तो इनकी अधिकतम सजा सात वर्ष से कम है।

उन्होंने यह भी बताया कि आरोपियों में से दो-दानिश (13 वर्ष) और जीनत (11 वर्ष) बच्चे हैं, और उन्हें आरोपी बनाना न केवल बाल संरक्षण सिद्धांतों का उल्लंघन है बल्कि पुलिस प्रक्रिया की भी अनदेखी है।

अदालत के अवलोकन

खंडपीठ ने नाबालिगों को आरोपी बनाए जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने निर्देश दिया,

बहरेच के पुलिस अधीक्षक तथ्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण करें और यदि नाबालिगों को झूठा फंसाया गया है तो दोषी अधिकारियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई करें।"

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता दिव्या गुप्ता उपस्थित हुईं, जिन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि जांच भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के अनुसार की जाएगी, जो सात वर्ष से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है।

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खंडपीठ ने जांच अधिकारियों को याद दिलाया कि उन्हें अरेश कुमार (2014) और सतींदर कुमार अंतिल (2022) के सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा। इन ऐतिहासिक फैसलों में यह स्पष्ट किया गया था कि गिरफ्तारी कोई औपचारिकता नहीं है, बल्कि केवल तभी की जानी चाहिए जब यह बिल्कुल आवश्यक हो।

पीठ ने कहा, "चूंकि सतींदर कुमार अंतिल में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय देश का कानून है, अतः सभी संबंधित व्यक्तियों को इसे अक्षरशः पालन करना होगा। इसका उल्लंघन न्यायालय की अवमानना के समान होगा।"

निर्णय

दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने एफआईआर को रद्द नहीं किया, बल्कि याचिकाकर्ताओं को मनमानी गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की। न्यायालय ने तथ्यों को ध्यान में रखते हुए याचिका निपटा दी और प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

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अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता संख्या 1, 2, 4 और 5 को 16 अक्टूबर 2025 को सुबह 11:00 बजे संबंधित जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर जांच में सहयोग करना होगा। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब तक वे विधिसम्मत समन का पालन करते हैं, उन्हें परेशान न किया जाए।

न्यायालय ने आगे यह भी निर्देश दिया कि अदालत की रजिस्ट्री तीन कार्यदिवसों के भीतर इस आदेश की प्रति बहरेच के पुलिस अधीक्षक को भेजे ताकि इसका अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।

अरेश कुमार और सतींदर कुमार अंतिल के दिशानिर्देशों को बाध्यकारी बताते हुए हाईकोर्ट ने पुनः दोहराया कि गिरफ्तारी को प्रताड़ना के साधन के रूप में नहीं देखा जा सकता, खासकर तब जब मामला मामूली अपराधों या बच्चों से संबंधित हो।

इस आदेश के साथ, मामला निपटा दिया गया, जिससे याचिकाकर्ताओं को आंशिक राहत मिली और राज्य की पुलिस व्यवस्था को एक सख्त संदेश गया कि कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई की जाए।

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