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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिमांशु दुबे के खिलाफ अपहरण का मामला खारिज किया, कहा- पीड़ित स्वेच्छा से घर छोड़कर गया था

हिमांशु दुबे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हिमांशु दुबे के खिलाफ अपहरण का मामला खारिज कर दिया, फैसला सुनाया कि पीड़िता स्वेच्छा से घर छोड़कर गई थी; अभियोजन पक्ष के पास महत्वपूर्ण साक्ष्य का अभाव था।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिमांशु दुबे के खिलाफ अपहरण का मामला खारिज किया, कहा- पीड़ित स्वेच्छा से घर छोड़कर गया था

एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देवरिया की एक किशोरी को भगाने के आरोप में हिमांशु दुबे के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि अपहरण के आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं थे क्योंकि पीड़िता ने खुद कहा कि उसने परिवार के उत्पीड़न के कारण घर छोड़ा था।

पृष्ठभूमि

यह मामला 25 दिसंबर 2020 को दर्ज एफआईआर से शुरू हुआ, जो कथित घटना के एक दिन बाद दर्ज हुई थी। शिकायतकर्ता, जो लड़की का मामा है, ने दुबे पर अपनी 16 वर्षीय भांजी को बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप लगाया। पुलिस ने इस पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 363 के तहत केस दर्ज किया, जो वैध अभिभावक की देखरेख से अपहरण के मामलों को कवर करता है।

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हालाँकि, जाँच के दौरान कहानी बदल गई। सीआरपीसी की धारा 161 के तहत पुलिस को दिए गए लड़की के शुरुआती बयान से पता चला कि वह अपने परिवार द्वारा की गई बुरी तरह पिटाई और यहाँ तक कि बिजली के झटके के कारण घर छोड़कर चली गई थी। बाद में, सीआरपीसी की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए अपने बयान में, उसने दोहराया कि वह अकेले सीवान गई थी, और उसमें आरोपियों की कोई संलिप्तता नहीं थी।

मेडिकल रिकॉर्ड में भी यह सामने आया कि लड़की की उम्र लगभग 18 साल थी और उसने आंतरिक चिकित्सकीय जांच से इनकार कर दिया था।

अदालत की टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद घटनाक्रम और पीड़िता के बयानों का बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पीड़िता ने कभी यह नहीं कहा कि दुबे ने उसे ले जाया या बहकाया। बल्कि उसने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि घर छोड़ने का उसका फैसला पूरी तरह स्वेच्छा से लिया गया था।

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पीठ ने कहा:

"सिर्फ बातचीत के रिश्ते को किसी को बहला-फुसलाने के बराबर नहीं माना जा सकता। धारा 363 आईपीसी के तहत अपराध साबित करने के लिए कुछ और - जैसे प्रलोभन, वादा या बल प्रयोग - दिखाना जरूरी है।"

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने चार्जशीट में पीड़िता को गवाह ही नहीं बनाया और मामला केवल माता-पिता के बयानों पर आधारित था। यह कमी केस को और कमजोर कर देती है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए जज ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई नाबालिग खुद अपनी मर्जी से, बिना किसी प्रलोभन या आरोपी की सक्रिय भागीदारी के घर छोड़ दे, तो धारा 361/363 आईपीसी लागू नहीं हो सकती।

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फैसला

अदालत ने पाया कि अपहरण या बहला-फुसलाने का कोई सबूत नहीं है और पूरा अभियोजन कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। आदेश में कहा गया:

"दिनांक 19.01.2021 की चार्जशीट, दिनांक 07.07.2023 का संज्ञान आदेश तथा मुकदमा संख्या 9029/2023 (राज्य बनाम हिमांशु दुबे), जो कि केस क्राइम संख्या 0382/2020 धारा 363 आईपीसी, थाना गौरी बाजार, जिला देवरिया से उत्पन्न हुआ है, को निरस्त किया जाता है।"

इसके साथ ही लगभग पांच साल की कानूनी लड़ाई के बाद दुबे अपहरण के आरोपों से मुक्त हो गए।

केस का शीर्षक: हिमांशु दुबे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य

केस संख्या: धारा 482 के अंतर्गत आवेदन संख्या 28653/2023

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