नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया। मामला तेलंगाना के एक अदालत कर्मचारी की बर्खास्तगी से जुड़ा था, जिसे कथित रूप से फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट देने के आरोप में नौकरी से हटा दिया गया था। अदालत ने पाया कि आरोप साबित करने में गंभीर कमी रह गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला Supreme Court of India में K. Rajaiah बनाम The High Court for the State of Telangana शीर्षक से आया। फैसले में दर्ज है कि अपीलकर्ता 1998 से अदालत में अटेंडर के पद पर कार्यरत थे ।
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अगस्त 2017 में वे 3 से 7 अगस्त तक ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हुए। उनका कहना था कि तेज बुखार और उल्टी-दस्त के कारण उन्होंने एक स्थानीय डॉक्टर से इलाज कराया और अस्पताल में भर्ती रहे। बाद में उन्होंने मेडिकल सर्टिफिकेट जमा किया।
कुछ समय बाद संबंधित डॉक्टर ने बयान दिया कि उन्होंने ऐसा कोई भर्ती प्रमाणपत्र जारी नहीं किया। इसी आधार पर विभागीय जांच शुरू हुई और कर्मचारी पर ‘फर्जी दस्तावेज’ देने का आरोप लगा। अंततः 13 नवंबर 2018 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। हाई कोर्ट ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी।
अदालत में क्या उठा सवाल?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान बार-बार एक मूल प्रश्न उठाया-क्या यह साबित हुआ कि मेडिकल सर्टिफिकेट वास्तव में फर्जी था?
पीठ ने कहा, “जब आरोप गंभीर हो, तो जांच में सतर्कता भी उतनी ही गंभीर होनी चाहिए।”
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जांच अधिकारी ने डॉक्टर के बयान के आधार पर प्रमाणपत्र को फर्जी मान लिया। लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड देखकर पाया कि डॉक्टर ने यह स्वीकार किया था कि कर्मचारी उनके पास इलाज के लिए आए थे और उन्होंने दवा भी दी थी।
हस्तलेखन जांच क्यों नहीं कराई गई?
पीठ ने खास तौर पर इस बात पर ध्यान दिया कि मेडिकल सर्टिफिकेट पूरी तरह हाथ से लिखा हुआ था। डॉक्टर के हस्ताक्षर पर विवाद था।
न्यायालय ने कहा, “जब दस्तावेज पूरी तरह हस्तलिखित हो और हस्ताक्षर विवादित हों, तो उसे हस्तलेखन विशेषज्ञ से जांच कराना उचित होता।”
अदालत ने रिकॉर्ड मंगवाकर खुद हस्ताक्षरों की तुलना की। पाया गया कि डॉक्टर के दो निर्विवाद हस्ताक्षर भी एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते। ऐसे में सीधे तौर पर प्रमाणपत्र को फर्जी मान लेना न्यायसंगत नहीं था।
प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि अदालत को विभागीय जांच में दखल नहीं देना चाहिए। इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि सामान्यतः न्यायिक समीक्षा सीमित होती है, लेकिन यदि निष्कर्ष “बिना ठोस साक्ष्य” के हों या “कोई भी समझदार व्यक्ति उस नतीजे पर न पहुंचे,” तो हस्तक्षेप संभव है।
पीठ ने कहा, “यहां निष्कर्ष पर्याप्त साक्ष्य पर आधारित नहीं थे।”
सजा पर अदालत की टिप्पणी
सरकारी नियमों के तहत ‘फर्जीवाड़ा’ साबित होने पर बर्खास्तगी अनिवार्य मानी गई थी। लेकिन अदालत ने कहा कि जब मूल आरोप ही सिद्ध नहीं हुआ, तो सजा का सवाल स्वतः खत्म हो जाता है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि कर्मचारी को पहले ही अनुपस्थिति के दिनों का वेतन काटकर दंडित किया जा चुका था।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के 12 फरवरी 2024 के फैसले को रद्द कर दिया । साथ ही 13 नवंबर 2018 की बर्खास्तगी और 8 जनवरी 2021 के अपीलीय आदेश को भी निरस्त कर दिया।
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अदालत ने आदेश दिया कि कर्मचारी को तत्काल सेवा में बहाल किया जाए और उन्हें सभी परिणामी लाभ, जिसमें बकाया वेतन भी शामिल है, प्रदान किए जाएं। यह प्रक्रिया तीन सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया गया।
Case Title: K. Rajaiah v. The High Court for the State of Telangana
Case No.: Civil Appeal No. 1560 of 2026 (@ SLP (C) No. 11965 of 2024)
Decision Date: 11 February 2026










