दिल्ली के बिजवासन रेलवे स्टेशन के पास प्रस्तावित बड़े विकास प्रोजेक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित जमीन को “डीम्ड फॉरेस्ट” नहीं माना जा सकता और वैधानिक मास्टर प्लान को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके साथ ही अदालत ने अपील खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला रेल लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (RLDA) द्वारा बिजवासन रेलवे स्टेशन के पास लगभग 12.4 हेक्टेयर जमीन पर मिश्रित उपयोग (रेजिडेंशियल + कमर्शियल) विकास योजना से जुड़ा है। यह परियोजना दिल्ली मास्टर प्लान 2021 का हिस्सा है।
पहले इस प्रोजेक्ट को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का दावा था कि इस जमीन पर बड़ी संख्या में पेड़ हैं, इसलिए इसे “डीम्ड फॉरेस्ट” माना जाना चाहिए। हालांकि NGT ने पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में याचिका खारिज कर दी।
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इसके बाद दो वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि जमीन पर घनी हरियाली और पेड़ों की संख्या इसे “डीम्ड फॉरेस्ट” बनाती है। उन्होंने कहा कि बिना केंद्र सरकार की अनुमति पेड़ों की कटाई कानून के खिलाफ होगी।
वहीं, RLDA और अन्य पक्षों ने कहा कि यह जमीन मूल रूप से कृषि भूमि थी और किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में इसे जंगल के रूप में दर्ज नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि सभी आवश्यक पर्यावरणीय अनुमतियां ली जाएंगी।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने “फॉरेस्ट” और “डीम्ड फॉरेस्ट” की अवधारणा पर विस्तार से विचार किया।
कोर्ट ने कहा,
“किसी जमीन को जंगल मानने का फैसला अलग-थलग तरीके से नहीं किया जा सकता, बल्कि उसके ऐतिहासिक उपयोग और सरकारी रिकॉर्ड को भी देखना जरूरी है।”
पीठ ने पाया कि यह जमीन पहले कृषि उपयोग में थी और बाद में मास्टर प्लान के तहत विकास के लिए चिन्हित की गई।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“मास्टर प्लान की वैधानिक बाध्यता और उसकी प्राथमिकता सर्वोपरि होगी।”
अहम कानूनी निष्कर्ष
- जिस जमीन को मास्टर प्लान के समय जंगल नहीं माना गया, उसे बाद में केवल पेड़ों की वृद्धि के आधार पर “डीम्ड फॉरेस्ट” नहीं कहा जा सकता।
- जमीन की प्रकृति तय करने की तारीख वही होगी जब मास्टर प्लान लागू हुआ।
- वैधानिक मास्टर प्लान को बाद की परिस्थितियों से अस्थिर नहीं किया जा सकता।
हालांकि कोर्ट ने अपील खारिज की, लेकिन पर्यावरण संरक्षण को लेकर निर्देश भी दिए।
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कोर्ट ने नोट किया कि:
- आवश्यक अनुमति लेकर ही पेड़ों की कटाई या स्थानांतरण होगा
- कुल क्षेत्र का 20% हिस्सा हरित क्षेत्र रहेगा
- वृक्ष प्रत्यारोपण (transplantation) और नए पेड़ लगाए जाएंगे
साथ ही कोर्ट ने कहा कि स्थानीय (native) प्रजातियों के पेड़ों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि संबंधित जमीन “फॉरेस्ट” है। इसलिए Forest (Conservation) Act, 1980 के तहत केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने NGT के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी और मामले को समाप्त कर दिया।
Case Title: Naveen Solanki & Anr. vs Rail Land Development Authority & Ors.
Case Number: Civil Appeal No. 10656 of 2024
Judge: Justice Dipankar Datta & Justice Augustine George Masih
Decision Date: March 20, 2026










