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23 साल पुराने मामले में बदली धारा, दहेज हत्या से हटकर आत्महत्या उकसाने का दोष: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने दहेज मृत्यु की सजा को बदलते हुए आरोपी को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी माना और पहले से काटी गई सजा को पर्याप्त बताया। - वीर पाल बनाम राज्य (NCT of Delhi)

Shivam Y.
23 साल पुराने मामले में बदली धारा, दहेज हत्या से हटकर आत्महत्या उकसाने का दोष: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 साल पुराने एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी की सजा में बड़ा बदलाव किया है। अदालत ने माना कि महिला की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई, लेकिन इसे “दहेज मृत्यु” साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत नहीं हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 1999 का है, जब सरवेश नाम की महिला की शादी के तीन साल के भीतर ही मौत हो गई। पुलिस को अस्पताल से सूचना मिली, जिसके बाद महिला के भाई की शिकायत पर FIR दर्ज हुई।

शिकायत में आरोप था कि पति वीर पाल ने शादी के बाद ₹50,000 की मांग की थी। परिवार ने ₹30,000 दे दिए, लेकिन बाकी रकम को लेकर महिला को लगातार प्रताड़ित किया जाता रहा।

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ट्रायल कोर्ट ने इन आरोपों को सही मानते हुए आरोपी को IPC की धारा 498A (क्रूरता) और 304B (दहेज मृत्यु) में दोषी ठहराया था।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की पीठ ने पूरे घटनाक्रम और सबूतों का गहराई से विश्लेषण किया।

अदालत ने कहा,

“दहेज की मांग और प्रताड़ना के सबूत मौजूद हैं, लेकिन यह साबित नहीं होता कि मौत आरोपी ने करवाई।”

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण जहर बताया गया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो सका कि जहर किसने दिया।

कोर्ट ने यह भी पाया कि कथित ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ (मृत्यु से पहले दिया गया बयान) भरोसेमंद नहीं है, क्योंकि मेडिकल रिकॉर्ड में महिला को बयान देने के लिए अयोग्य बताया गया था।

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अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा,

“परिस्थितियाँ यह संकेत देती हैं कि महिला लगातार दबाव और प्रताड़ना में थी, जिससे उसने खुद ही अपनी जान ले ली हो सकती है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दहेज मृत्यु (Section 304B IPC) के लिए यह साबित होना जरूरी है कि मौत सीधे तौर पर दहेज उत्पीड़न से जुड़ी हो।

लेकिन इस मामले में, भले ही प्रताड़ना साबित हुई, पर मौत का कारण आरोपी की सीधी भूमिका से जुड़ा नहीं पाया गया।

इसलिए अदालत ने इसे “आत्महत्या के लिए उकसाने” (Section 306 IPC) के रूप में माना।

अदालत ने आरोपी वीर पाल की धारा 304B IPC के तहत सजा को रद्द कर दिया और उसे धारा 306 IPC (आत्महत्या के लिए उकसाना) में दोषी ठहराया।

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साथ ही, धारा 498A के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।

सजा पर राहत देते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपी पहले ही करीब 3 साल 8 महीने जेल में बिता चुका है, इसलिए आगे की सजा की आवश्यकता नहीं है।

अदालत ने आदेश दिया कि “पहले से भुगती गई सजा को पर्याप्त माना जाए।”

Case Title: Veer Pal v. State (NCT of Delhi)

Case Number: CRL.A. 73/2003

Decision Date: 16 March 2026

Counsels

  • For Appellant: Ms. Aashaa Tiwari, Advocate with Mr. Puneet Narula, Advocate
  • For Respondent (State): Ms. Kiran Bairwa, APP with SI Preeti (PS SP Badli)

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