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दिल्ली हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न केस रद्द करने की याचिका खारिज की, कहा विभागीय क्लीन चिट पर्याप्त नहीं

आसिफ हामिद खान बनाम राज्य एवं अन्य - दिल्ली उच्च न्यायालय ने वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला रद्द करने से इनकार कर दिया, तथा कहा कि विभागीय दोषमुक्ति पर्याप्त नहीं है।

Shivam Y.
दिल्ली हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न केस रद्द करने की याचिका खारिज की, कहा विभागीय क्लीन चिट पर्याप्त नहीं

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आरोपों में चल रही आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। 28 अगस्त 2025 को सुनाए गए विस्तृत आदेश में न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने आसिफ हामिद खान की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ आईपीसी की धारा 354A और 509 के तहत जारी समन को रद्द करने की मांग की थी।

पृष्ठभूमि

मामला श्रुति भारद्वाज, जो उस समय दिल्ली में तैनात कश्मीर प्रशासनिक सेवा की अधिकारी थीं, की शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया था कि अतिरिक्त रेज़िडेंट कमिश्नर के पद पर कार्यरत खान ने उनके साथ कार्यस्थल पर बार-बार उत्पीड़न किया - उनकी सूरत-सूरत पर अशोभनीय टिप्पणियाँ करने से लेकर निजी मुलाकात के लिए दबाव डालने तक।

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हालांकि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act) के तहत बनी आंतरिक समिति ने खान को क्लीन चिट दे दी थी, लेकिन भारद्वाज ने साथ ही फरवरी 2015 में एक एफआईआर भी दर्ज कराई। पुलिस ने दो बार क्लोज़र रिपोर्ट दायर की, यह कहते हुए कि कोई पुष्ट सबूत नहीं है। लेकिन मजिस्ट्रेट ने असहमति जताई, संज्ञान लिया और समन जारी कर दिए। खान की पुनरीक्षण याचिका भी 2018 में सेशन कोर्ट ने खारिज कर दी थी।

अदालत की टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट में खान ने दलील दी कि जब आंतरिक जांच और पुलिस दोनों ने उन्हें बरी कर दिया था, तो आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कई गवाहों ने शिकायतकर्ता का समर्थन नहीं किया और फोन से मिले कुछ संदेश आपसी सौहार्दपूर्ण संबंध दिखाते हैं।

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हालांकि, न्यायमूर्ति कृष्णा ने कहा कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे पूरी तरह अलग उद्देश्यों के लिए होते हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया,

"विभागीय कार्यवाही में प्रमाण का मानक आपराधिक मुकदमे जैसा नहीं होता। दोनों अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं और एक-दूसरे को बाध्यकारी नहीं बना सकते।"

न्यायाधीश ने यह भी रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता की गवाही, सहकर्मियों के बयानों के साथ, इस स्तर पर पर्याप्त है। उन्होंने कहा कि कई गवाहों ने शिकायतकर्ता की पीड़ा और उनके खुलासे की पुष्टि की।

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आदेश में टिप्पणी की गई,

"सम्मान और गरिमा के साथ सुरक्षित कार्य वातावरण, लैंगिक समानता का मूल आधार है।"अदालत ने यह भी जोड़ा कि पीड़िता के दृष्टिकोण से ही किसी व्यवहार का मूल्यांकन होना चाहिए, जो दूसरों को मामूली लग सकता है।

फैसला

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि खान को तलब करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं और मजिस्ट्रेट तथा सेशन कोर्ट के आदेश सही हैं।

बेंच ने कहा,

"यदि शिकायतकर्ता की गवाही उच्च गुणवत्ता की हो, तो वही आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त है। यहाँ तो पुष्ट बयानों का भी सहारा है।"

याचिका खारिज कर दी गई और अब आपराधिक मुकदमा आगे बढ़ेगा।

केस का शीर्षक: आसिफ हामिद खान बनाम राज्य एवं अन्य

केस संख्या: W.P. (Crl.) 3501/2018 & CRL.M.A. 47419/2018

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