दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सेना के पूर्व जवान की दूसरी पत्नी को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि जब पहली पत्नी जीवित थी और विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ था, तब किया गया दूसरा विवाह कानून की नजर में मान्य नहीं माना जा सकता।
यह फैसला 18 फरवरी 2026 को दिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता विद्या देवी ने अदालत को बताया कि उनके पति स्वर्गीय सिपाही उदय सिंह भारतीय सेना में 1963 में भर्ती हुए थे और 1979 में सेवानिवृत्त हुए। बाद में वे एक अन्य सरकारी संस्थान में भी कार्यरत रहे और पेंशन प्राप्त करते रहे।
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विद्या देवी का कहना था कि उनका विवाह उदय सिंह से उस समय हुआ जब उन्हें बताया गया कि वे अविवाहित हैं। विवाह से तीन बच्चे हुए। बाद में उन्हें पता चला कि उदय सिंह की पहले से एक पत्नी, सतवती देवी, मौजूद हैं।
उदय सिंह का निधन 27 सितंबर 2011 को हो गया। पहली पत्नी का निधन 13 मई 2012 को हुआ। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उन्हें पारिवारिक पेंशन मिलनी चाहिए।
आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि वे अपने पति के साथ उनके निधन तक रहीं और वास्तविक रूप से पत्नी की तरह जीवन बिताया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि कुछ परिस्थितियों में दूसरी पत्नी को भी पेंशन का लाभ दिया गया है।
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उनका कहना था कि पहली पत्नी की मृत्यु के बाद विधवा का अधिकार उन पर आ गया।
अदालत की टिप्पणी
डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा शामिल थे, ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार, यदि विवाह के समय पति या पत्नी का पूर्व विवाह जीवित है, तो दूसरा विवाह शून्य (void) माना जाता है।
अदालत ने कहा, “पारिवारिक पेंशन केवल उस विधवा को मिल सकती है जो विधिक रूप से वैध पत्नी हो।”
पीठ ने यह भी कहा कि उदय सिंह ने अपने जीवनकाल में पहली शादी को कानूनी रूप से समाप्त नहीं किया। इसलिए दूसरी शादी कानून की नजर में वैध नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर स्पष्टीकरण
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का सहारा लिया था, जिसमें दूसरी पत्नी को पेंशन का लाभ दिया गया था। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि उस मामले के तथ्य अलग थे। वहां पहली पत्नी से विधिवत तलाक हो चुका था और लंबे समय तक साथ रहने के आधार पर विवाह की वैधता मानी गई थी।
यहां स्थिति अलग थी, क्योंकि पहली पत्नी उदय सिंह की मृत्यु के समय जीवित थीं और वे ही वैध विधवा थीं।
अदालत ने कहा, “पहली पत्नी की बाद की मृत्यु से दूसरी शादी अपने आप वैध नहीं हो जाती।”
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पेंशन नियमों पर अदालत की राय
पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला सेना की पेंशन विनियम, 1961 के तहत आता है। इन नियमों के अनुसार पारिवारिक पेंशन उसी पत्नी को मिलती है जो विधिक रूप से वैध विवाह में बंधी हो।
याचिकाकर्ता द्वारा केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 2021 के एक कार्यालय ज्ञापन का भी हवाला दिया गया, लेकिन अदालत ने माना कि वे नियम इस मामले पर लागू नहीं होते।
अंतिम निर्णय
अदालत ने कहा कि संबंधित विभाग द्वारा 5 मार्च 2013 को पारिवारिक पेंशन अस्वीकार करने का निर्णय सही था और ट्रिब्यूनल ने भी सही रूप से उसे बरकरार रखा।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।
Case Title: Vidya Devi v. Union of India & Ors.
Case No.: W.P.(C) 2333/2026
Decision Date: 18 February 2026










