इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि जब किसी अभियुक्त की उम्र से जुड़े वैध दस्तावेज उपलब्ध हों, तब मेडिकल परीक्षण (ओसिफिकेशन टेस्ट) कराना कानून के खिलाफ है। अदालत ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की प्रक्रिया को नजरअंदाज करने पर निचली अदालतों के आदेश रद्द कर दिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला प्रतापगढ़ में 11 मार्च, 2025 को दर्ज की गई एफआईआर से संबंधित है, जिसमें एक नाबालिग के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और POCSO अधिनियम के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया है। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि लगभग 15 वर्षीय आरोपी ने पीड़िता के साथ यौन उत्पीड़न किया और उसे धमकी दी।
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अभियुक्त की सही उम्र को लेकर विवाद खड़ा हो गया। हाई स्कूल प्रमाणपत्र में उसकी जन्मतिथि 1 जनवरी, 2010 दर्ज थी, जबकि प्राथमिक विद्यालय के रजिस्टर में यह 13 मई, 2009 दर्ज थी। इस विसंगति के आधार पर, किशोर न्याय बोर्ड ने अस्थि-निर्माण परीक्षण का आदेश दिया, जिसे बाद में अपीलीय न्यायालय ने भी बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति मनीष कुमार की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2015 की धारा 94 स्पष्ट रूप से उम्र निर्धारण की प्रक्रिया तय करती है।
अदालत ने कहा,
“धारा 94 के अनुसार, यदि स्कूल या मैट्रिक प्रमाणपत्र उपलब्ध हैं, तो उन्हीं के आधार पर उम्र तय की जानी चाहिए। मेडिकल टेस्ट केवल अंतिम विकल्प है।”
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पीठ ने यह भी नोट किया कि दोनों दस्तावेजों के अनुसार आरोपी घटना के समय 16 वर्ष से कम ही था, इसलिए मेडिकल परीक्षण की कोई आवश्यकता नहीं थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और अपीलीय अदालत दोनों ने कानून के स्पष्ट प्रावधानों का उल्लंघन किया है।
अदालत ने दोनों आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि:
- मेडिकल परीक्षण का आदेश गलत था
- उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही उम्र तय की जानी चाहिए थी
इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने का आदेश दिया, कुछ शर्तों के साथ, जिनमें अभिभावक की निगरानी और नियमित उपस्थिति शामिल है।
Case Details
Case Title: Pradeep Kori @ Pradeep Harijan (Minor) vs State of U.P.
Case Number: Criminal Revision No. 1470 of 2025
Judge: Justice Manish Kumar
Decision Date: March 25, 2026










