करीब पांच दशक पुराने एक चर्चित मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आरोप था कि पुलिस हिरासत में एक व्यक्ति को अवैध रूप से बंद रखकर मारपीट की गई और उससे कबूलनामा लेने की कोशिश की गई।
आजीवन गीता गोपी की एकल पीठ ने दोनों आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया और आरोपी पुलिस अधिकारी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
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मामला क्या था?
मूल शिकायतकर्ता मेरग हाजा ने आरोप लगाया था कि 7 अक्टूबर 1976 को उसके घर की तलाशी ली गई। इसके बाद उसे पोरबंदर पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जहां कथित रूप से मारपीट की गई।
उसका कहना था कि मारपीट के कारण उसकी बाईं जांघ की हड्डी (फीमर) में फ्रैक्चर हो गया। बाद में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया।
यह मामला निजी शिकायत के रूप में दर्ज हुआ और कई वर्षों तक विभिन्न अदालतों में कार्यवाही चलती रही। अंततः 2003 में सत्र न्यायालय ने आरोपी पुलिस अधिकारी एस.एस. खंडवावाला को भारतीय दंड संहिता की धारा 331, 348, 352, और 365 के तहत दोषी ठहराते हुए पांच वर्ष तक की सजा सुनाई थी।
राज्य सरकार ने सजा बढ़ाने की मांग की, जबकि आरोपी ने दोषसिद्धि को चुनौती दी।
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अदालत में क्या दलीलें हुईं?
बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता की गिरफ्तारी शस्त्र अधिनियम के तहत वैध थी। इसलिए अपहरण या अवैध हिरासत का सवाल ही नहीं उठता।
उन्होंने यह भी कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड में पुलिस यातना का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
दूसरी ओर, राज्य की ओर से कहा गया कि शिकायतकर्ता को हिरासत में बुरी तरह पीटा गया, जिससे स्थायी चोट आई। “पीड़ित को गंभीर शारीरिक कष्ट हुआ और उसे न्याय मिलना चाहिए,” राज्य की ओर से दलील दी गई।
मेडिकल साक्ष्य पर कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने डॉक्टरों की गवाही का विस्तार से विश्लेषण किया। सिविल सर्जन ने केवल बाईं जांघ की हड्डी में फ्रैक्चर का उल्लेख किया।
कोर्ट ने पाया कि कथित मारपीट के अन्य बाहरी चोटों का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
पीठ ने कहा कि डॉक्टर ने यह भी स्वीकार किया कि ऐसी चोट गिरने या अन्य कारणों से भी संभव है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि यदि यह स्पष्ट रूप से हिरासत में यातना का मामला होता, तो इसे मेडिको-लीगल केस के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए था, जिसका ठोस रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया।
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गवाहों और घटनाक्रम पर सवाल
पीठ ने पाया कि शिकायत में देरी हुई थी। कथित घटना 7-8 अक्टूबर 1976 की थी, जबकि औपचारिक शिकायत 2 नवंबर 1976 को की गई।
कोर्ट ने यह भी देखा कि जिन अन्य व्यक्तियों को उसी समय पुलिस ने पकड़ा था, उन्होंने यातना की कोई शिकायत नहीं की।
तलाशी की कार्यवाही और गिरफ्तारी के संबंध में भी रिकॉर्ड में विरोधाभास पाए गए।
अदालत का निर्णय
सभी साक्ष्यों और गवाहियों का मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को “संदेह से परे” सिद्ध करने में असफल रहा है।
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल आरोप पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उन्हें विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य से समर्थित होना चाहिए।
अंततः, अदालत ने ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि आदेश रद्द करते हुए आरोपी एस.एस. खंडवावाला को बरी कर दिया।
राज्य द्वारा सजा बढ़ाने की अपील भी खारिज कर दी गई।
Case Title: State of Gujarat v. Shabbirhusein Shekhadam Khandvawala & Ors.
Case No.: Criminal Appeal No. 1509 of 2003 (with Criminal Appeal No. 1195 of 2003)
Decision Date: 24 February 2026










