कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कथित द्विविवाह (Bigamy) के मामले में पति, कथित दूसरी पत्नी और बच्चों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल “अवैध संबंध” या साथ रहने से भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत द्विविवाह का अपराध स्थापित नहीं होता।
न्यायमूर्ति आर. नटराज की एकल पीठ ने यह आदेश कई आपराधिक याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पारित किया, जिनमें मैसूरु की ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों के खिलाफ संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला उस निजी शिकायत से जुड़ा है जिसे मंजुला पी. ने अपने पति टी. बालन के खिलाफ दायर किया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि बालन ने अपने विवाह के दौरान ही एक अन्य महिला विजयलक्ष्मी से विवाह कर लिया।
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शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि उनके दोनों बेटे, जो मामले में आरोपी बनाए गए थे, इस कथित संबंध के बारे में जानते थे और चुपचाप उसका समर्थन कर रहे थे।
ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता का शपथ बयान दर्ज करने के बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 494 (द्विविवाह) और 34 (समान आशय) के तहत संज्ञान लेते हुए सभी आरोपियों को समन जारी किया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि धारा 494 के तहत केवल वही व्यक्ति अभियोजित किया जा सकता है जिसने दूसरी शादी की हो।
उन्होंने यह भी कहा कि शिकायत में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कथित दूसरी शादी कब और कहाँ हुई। शिकायत में केवल इतना कहा गया था कि आरोपी पति और महिला एक अवैध संबंध में रह रहे हैं।
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दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि बच्चों ने पिता के कथित द्विविवाह का समर्थन किया और दूसरी महिला ने पारिवारिक जीवन को प्रभावित किया, इसलिए उन्हें भी आरोपी बनाया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि IPC की धारा 494 तभी लागू होती है जब यह साबित हो कि किसी व्यक्ति ने अपने जीवित जीवनसाथी के रहते दूसरी शादी की है।
अदालत ने कहा कि इस अपराध के लिए वास्तविक विवाह का प्रमाण आवश्यक है। केवल साथ रहना या अवैध संबंध में होना द्विविवाह का अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि इस अपराध में सामान्यतः केवल वह पति या पत्नी जिम्मेदार हो सकता है जिसने दूसरी शादी की हो, अन्य रिश्तेदारों को इसमें आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
इन परिस्थितियों को देखते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त आधार के संज्ञान ले लिया था।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के 1 अक्टूबर 2018 के आदेश को रद्द करते हुए सभी आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी।










