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मद्रास हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारी की याचिका खारिज की, मानवाधिकार आयोग का ₹5 लाख मुआवजा आदेश बरकरार

श्रीमती मगिता अन्ना क्रिस्टी बनाम राज्य मानवाधिकार आयोग, तमिलनाडु और अन्य। मद्रास हाईकोर्ट ने मानवाधिकार आयोग के ₹5 लाख मुआवजा आदेश को बरकरार रखते हुए महिला सब-इंस्पेक्टर की याचिका खारिज की।

Vivek G.
मद्रास हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारी की याचिका खारिज की, मानवाधिकार आयोग का ₹5 लाख मुआवजा आदेश बरकरार

चेन्नई से एक अहम फैसला सामने आया है। मद्रास हाईकोर्ट ने एक महिला सब-इंस्पेक्टर की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने तमिलनाडु राज्य मानवाधिकार आयोग के आदेश को चुनौती दी थी। आयोग ने उनके खिलाफ गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन का मामला मानते हुए 5 लाख रुपये मुआवजा देने और सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की थी।

कोर्ट ने साफ कहा कि जब आरोपों का जवाब ही नहीं दिया गया, तो बाद में आदेश पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला S.H.R.C. No.11153/2018 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि जब वह हिरासत में थी, तब संबंधित महिला पुलिस अधिकारी — जो उस समय गुडुवांचेरी पुलिस स्टेशन में सब-इंस्पेक्टर के पद पर तैनात थीं - ने उनके साथ मारपीट की, लाठी से हमला किया और उनके पास से नकदी व सामान छीन लिया।

शिकायत पर तमिलनाडु राज्य मानवाधिकार आयोग ने सुनवाई शुरू की। पुलिस अधिकारी को नोटिस भी जारी किया गया। रिकॉर्ड के अनुसार, उन्हें कई अवसर दिए गए कि वे अपना जवाब दाखिल करें या साक्ष्य प्रस्तुत करें। लेकिन उन्होंने न तो लिखित जवाब दिया और न ही कोई दस्तावेज पेश किया।

शिकायतकर्ता ने अपनी ओर से शपथपत्र और मेडिकल रिकॉर्ड समेत कई दस्तावेज आयोग के सामने रखे। मेडिकल रिपोर्ट और चोटों की तस्वीरें भी पेश की गईं।

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आयोग की टिप्पणियां

आयोग ने अपने आदेश में कहा कि मेडिकल साक्ष्य और तस्वीरें शिकायत का समर्थन करती हैं। आदेश में दर्ज है कि एक पुलिस अधिकारी का कर्तव्य केवल गिरफ्तारी और कानून के अनुसार कार्रवाई करना है, किसी भी व्यक्ति को पीटना नहीं।

आयोग ने अपने निष्कर्ष में कहा:

“शिकायतकर्ता की सभी बातें मेडिकल साक्ष्य और तस्वीरों से प्रमाणित होती हैं। पुलिस का काम कानून के तहत कार्रवाई करना है, किसी को शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना नहीं। यहां जो घटनाएं सामने आई हैं, वे मानव गरिमा और सुरक्षा के अधिकार का गंभीर उल्लंघन हैं।”

आयोग ने यह भी कहा कि महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति का उद्देश्य पुलिस व्यवस्था को अधिक संवेदनशील बनाना है, लेकिन इस मामले में परिस्थितियां इसके विपरीत दिखाई देती हैं।

इन तथ्यों के आधार पर आयोग ने 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और संबंधित अधिकारी के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की।

हाईकोर्ट में चुनौती

इसके बाद पुलिस अधिकारी ने मद्रास हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। उन्होंने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने अपनी गवाही के दौरान 3.5 लाख रुपये लेकर शिकायत वापस लेने की इच्छा जताई थी। उनके अनुसार, इससे यह संकेत मिलता है कि शिकायत का मकसद केवल धन वसूली था।

मामले की सुनवाई डॉ. जस्टिस अनीता सुमंथ और जस्टिस मुम्मिनेनी सुधीर कुमार की खंडपीठ के समक्ष हुई।

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अदालत की टिप्पणी

कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलील को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि आयोग के सामने गंभीर आरोप लगाए गए थे और उनका कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया।

अदालत ने कहा:

“जब नोटिस मिलने के बावजूद कई अवसरों पर कोई काउंटर दाखिल नहीं किया गया, तो यह आचरण आरोपों को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करने जैसा प्रतीत होता है।”

पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता ने आयोग के निर्देश के बावजूद आवश्यक दस्तावेज, जैसे रिमांड रिपोर्ट, पेश नहीं की।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण अधिकार का प्रयोग नहीं किया जा सकता, खासकर जब याचिकाकर्ता का रवैया सहयोगपूर्ण नहीं रहा हो।

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फैसला

अंततः मद्रास हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मानवाधिकार आयोग के 19.04.2021 के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें हस्तक्षेप किया जाए।

Case Title: Mrs. Magitha Anna Christy v. State Human Rights Commission, Tamil Nadu & Anr.

Case No.: W.P. No.14267 of 2021

Decision Date: February 2026

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