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राजस्थान हाईकोर्ट ने पत्नी को दी राहत, मानसिक क्रूरता मानते हुए 8 साल पुरानी शादी तोड़ी

श्रीमती खुशबू बनाम मनोहर लाल, राजस्थान हाईकोर्ट ने मानसिक क्रूरता मानते हुए पत्नी को तलाक दिया। पति की गैरहाजिरी और भरण-पोषण न देने को माना गंभीर आधार।

Vivek G.
राजस्थान हाईकोर्ट ने पत्नी को दी राहत, मानसिक क्रूरता मानते हुए 8 साल पुरानी शादी तोड़ी

जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए उसकी शादी को समाप्त कर दिया। अदालत ने माना कि पति का लगातार अदालतों से अनुपस्थित रहना, भरण-पोषण न देना और वैवाहिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

यह मामला पारिवारिक अदालत, पोखरण के उस आदेश के खिलाफ था, जिसमें पत्नी की तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया।

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क्या था मामला?

रिकॉर्ड के अनुसार, महिला की शादी 29 जून 2018 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। कुछ समय बाद उसने आरोप लगाया कि पति और उसके परिवार ने दहेज की मांग को लेकर उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया।

17 फरवरी 2021 को बेटी के जन्म के बाद स्थिति और बिगड़ गई। पत्नी का कहना था कि सिर्फ बेटी होने के कारण उसे अपमानित किया गया और पति ने दोबारा शादी करने की बात तक कही।

जब समझौते की कोशिशें नाकाम रहीं, तो पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की। हालांकि फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि क्रूरता साबित नहीं हुई।

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पति का अदालतों में रवैया

हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान पति ने पहले वकील के जरिए उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन बाद में न तो मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल हुआ और न ही नियमित सुनवाई में। अदालत ने उसे एकतरफा (एक्स-पार्टी) घोषित कर दिया।

रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि पति अन्य मामलों-जैसे भरण-पोषण (धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता) और घरेलू हिंसा अधिनियम-में भी लगातार गैरहाजिर रहा।

अंतरिम भरण-पोषण के आदेश के बावजूद पूरी रकम का भुगतान नहीं किया गया। अदालत ने पाया कि कई बार रिकवरी वारंट जारी हुए, फिर भी पालन नहीं हुआ।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने कहा कि पति का आचरण “लगातार उपेक्षा, उदासीनता और न्यायालय के आदेशों की अवहेलना” दर्शाता है।

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “बार-बार अदालत में उपस्थित न होना, भरण-पोषण न देना और वैवाहिक दायित्वों से जानबूझकर पीछे हटना मानसिक क्रूरता का निरंतर स्वरूप है।”

अदालत ने यह भी माना कि फैमिली कोर्ट ने घटनाओं को अलग-अलग देखकर आंका, जबकि मानसिक क्रूरता का मूल्यांकन पूरे घटनाक्रम को समग्र रूप से देखकर किया जाना चाहिए।

एक अन्य टिप्पणी में कहा गया कि पत्नी की गवाही “स्पष्ट, सुसंगत और विश्वसनीय” थी और जिरह के दौरान भी उसे कमजोर नहीं किया जा सका। ऐसे में निचली अदालत द्वारा याचिका खारिज करना साक्ष्यों के गलत मूल्यांकन का उदाहरण है।

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अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि पति ने न केवल वैवाहिक दायित्वों को छोड़ा, बल्कि कानूनी कार्यवाही से भी दूरी बनाई। यह आचरण उसके अपने बचाव के अधिकार को खोने जैसा है।

अदालत ने पारिवारिक अदालत, पोखरण का 20 अगस्त 2024 का फैसला निरस्त करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली।

इसके साथ ही हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका मंजूर की गई और दोनों के बीच का विवाह विधिवत रूप से समाप्त कर दिया गया। डिक्री शीट तैयार करने का निर्देश भी दिया गया।

Case Title: Smt. Khusboo v. Manohar Lal

Case No.: D.B. Civil Misc. Appeal No. 2708/2024

Decision Date: 03 February 2026

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