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सोशल मीडिया पर कमेंट करने वाली महिला को राहत: मद्रास हाईकोर्ट ने FIR रद्द की, कहा- ‘कोई अपराध नहीं बनता’

सौधामणी बनाम पुलिस निरीक्षक एवं अन्य। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने सोशल मीडिया टिप्पणी मामले में महिला के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की, IPC और IT Act की धाराएं अनुपयुक्त बताईं।

Vivek G.
सोशल मीडिया पर कमेंट करने वाली महिला को राहत: मद्रास हाईकोर्ट ने FIR रद्द की, कहा- ‘कोई अपराध नहीं बनता’

सोशल मीडिया पर एक पोस्ट पर टिप्पणी करना क्या आपराधिक मामला बन सकता है? इसी सवाल पर सोमवार को मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने अहम फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी वीडियो पर टिप्पणी करने से, बिना किसी प्रत्यक्ष आपराधिक कृत्य के, गंभीर धाराओं में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

एल. विक्टोरिया गौरी ने महिला मुहम्मद के खिलाफ दर्ज दस्तयाब को रद्द कर दिया।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता सौधमणि के खिलाफ त्रिची के CCD-III थाने में क्राइम नंबर 12/2024 दर्ज किया गया था । आरोप था कि उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर साझा किए गए एक वीडियो पर टिप्पणी की थी।

वीडियो में कथित तौर पर तीन नाबालिग स्कूली छात्राएं शराब की बोतल पकड़े दिखाई दे रही थीं। शिकायतकर्ता, जो एक राजनीतिक दल से जुड़े पदाधिकारी और जिला आईटी समन्वयक हैं, ने आरोप लगाया कि यह पोस्ट और उस पर की गई टिप्पणी कानून का उल्लंघन है।

पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 504 (उत्तेजना), 505(1)(b) (सार्वजनिक शांति भंग करने वाला बयान), 153 (उकसावा), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66E (गोपनीयता का उल्लंघन) और किशोर न्याय अधिनियम की धाराओं 74 और 77 के तहत मामला दर्ज किया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने न तो वीडियो बनाया, न साझा किया, बल्कि केवल एक राजनीतिक टिप्पणी की थी।

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अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सबसे पहले किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 74 पर विचार किया। यह धारा किसी भी कानूनी कार्यवाही में शामिल बच्चे की पहचान उजागर करने पर रोक लगाती है।

अदालत ने कहा, “इस मामले में याचिकाकर्ता किसी जांच, पूछताछ या न्यायिक प्रक्रिया से संबंधित नहीं हैं। उन्होंने केवल एक वीडियो पर टिप्पणी की है।”

धारा 77, जो नाबालिग को नशीला पदार्थ देने से संबंधित है, पर अदालत ने साफ कहा कि “यह आरोप भी याचिकाकर्ता पर लागू नहीं होता, क्योंकि उन्होंने किसी को शराब नहीं दी।”

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66E, जो निजता के उल्लंघन से जुड़ी है, पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वीडियो किसी तीसरे व्यक्ति ने साझा किया था। याचिकाकर्ता ने केवल उस पर प्रतिक्रिया दी थी। इसलिए यह धारा भी लागू नहीं होती।

राजनीतिक पृष्ठभूमि पर टिप्पणी

अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता एक राजनीतिक दल से जुड़े हैं, जबकि याचिकाकर्ता दूसरे दल की समर्थक प्रतीत होती हैं।

पीठ ने कहा, “न तो किसी प्रकार की सार्वजनिक अशांति हुई और न ही आम जनता से कोई शिकायत आई। केवल एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के आधार पर मामला दर्ज किया गया प्रतीत होता है।”

इस टिप्पणी के साथ अदालत ने IPC की धाराओं 504, 505(1)(b) और 153 को भी अनुपयुक्त माना।

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अंतिम निर्णय

सभी पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड देखने के बाद अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि क्राइम नंबर 12/2024 की एफआईआर रद्द की जाती है ।

न्यायालय ने कहा कि दर्ज की गई धाराओं के तहत कोई प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनता। इसके साथ ही आपराधिक मूल याचिका स्वीकार कर ली गई और संबंधित अन्य याचिकाएं भी बंद कर दी गईं।

Case Title: Sowdhamani vs The Inspector of Police & Anr.

Case No.: CRL OP (MD) No.13858 of 2024

Decision Date: 19 January 2026

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