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विभागीय जांच में राहत, लेकिन आपराधिक केस जारी रहेगा: सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त की अपील मंजूर की

कर्नाटक लोकायुक्त बनाम चन्द्रशेखर एवं अन्य। विभागीय जांच में बरी होने के बावजूद रिश्वत मामले में आपराधिक केस जारी रहेगा, सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त की अपील स्वीकार की।

Vivek G.
विभागीय जांच में राहत, लेकिन आपराधिक केस जारी रहेगा: सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त की अपील मंजूर की

नई दिल्ली में मंगलवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाया-क्या विभागीय जांच में आरोपी के बरी होने से आपराधिक मुकदमा अपने-आप खत्म हो जाता है?

कर्नाटक लोकायुक्त की ओर से दायर अपील पर फैसला सुनाते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि दोनों कार्यवाहियां अलग हैं और विभागीय जांच में मिली राहत के आधार पर आपराधिक केस रोका नहीं जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कर्नाटक के बागलकोट जिले से जुड़ा है। एक सरकारी बिजली विभाग के कार्यपालक अभियंता पर आरोप था कि उसने एक ठेकेदार से पांच बिल पास करने के बदले प्रति बिल दो हजार रुपये की रिश्वत मांगी।

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ठेकेदार की शिकायत पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने जाल बिछाया। जांच के दौरान अभियंता के पास से रिश्वत की रकम बरामद हुई और केमिकल टेस्ट में हाथों पर रंग भी आया।

इसी दौरान दो समानांतर कार्यवाहियां शुरू हुईं-

  • विभागीय जांच
  • लोकायुक्त के जरिए आपराधिक मुकदमा

विभागीय जांच में अभियंता को आरोपों से मुक्त कर दिया गया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई। इसी आदेश को चुनौती देते हुए लोकायुक्त सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

हाईकोर्ट ने कहा था कि जब विभागीय जांच में आरोप साबित नहीं हुए, तो आपराधिक मुकदमा चलाने का कोई औचित्य नहीं बचता। अदालत ने यह भी माना कि आपराधिक मामलों में प्रमाण का स्तर अधिक सख्त होता है।

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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

जस्टिस के. विनोद चंद्रन की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस तर्क से असहमति जताई।
अदालत ने साफ कहा-

“विभागीय जांच और आपराधिक अभियोजन समानांतर लेकिन स्वतंत्र प्रक्रियाएं हैं। एक का नतीजा दूसरे को स्वतः प्रभावित नहीं करता।”

पीठ ने बताया कि विभागीय जांच में आरोप साबित करने के लिए केवल “संभावनाओं का पलड़ा भारी” होना पर्याप्त होता है, जबकि आपराधिक मुकदमे में आरोप “संदेह से परे” साबित करने होते हैं।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि विभागीय जांच में अभियंता को राहत तकनीकी कारणों से मिली थी-जैसे एक अहम अधिकारी का गवाही न देना-ना कि आरोप पूरी तरह झूठे पाए जाने के कारण।

सुप्रीम कोर्ट ने जांच रिकॉर्ड का जिक्र करते हुए कहा कि ठेकेदार और स्वतंत्र गवाहों के बयान से यह स्पष्ट होता है कि रिश्वत की मांग और स्वीकार दोनों हुए।
पीठ ने कहा कि यदि विभागीय जांच में साक्ष्य सही ढंग से पेश नहीं किए गए, तो इसका यह मतलब नहीं कि आपराधिक अदालत में भी ऐसा ही होगा।

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए लोकायुक्त की अपील स्वीकार कर ली।
अदालत ने स्पष्ट किया कि:

  • आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा
  • विभागीय जांच दोबारा नहीं खुलेगी
  • यदि आपराधिक केस में दोष सिद्ध होता है, तो सेवा नियमों के अनुसार उसके परिणाम भुगतने होंगे

Case Title: The Karnataka Lokayuktha vs Chandrashekar & Anr.

Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 13057 of 2025

Case Type: Criminal Appeal

Decision Date: 06 January 2026

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