सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम आदेश में कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई अब ऐसी पीठ करेगी, जिसके न्यायाधीश भविष्य में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनने की कतार में न हों। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने स्वयं इस मामले से अलग होने का फैसला किया।
याचिकाओं में मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की वैधता को चुनौती दी गई है। इस कानून में चयन समिति से CJI को बाहर कर दिया गया है, जबकि पहले अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ फैसले में CJI को शामिल करने का निर्देश था।
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याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नई चयन समिति में कार्यपालिका (सरकार) का प्रभाव ज्यादा है, जिससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। साथ ही, कानून की धारा 7 को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन बताया गया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई की।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा,
“बेहतर होगा कि यह मामला ऐसी पीठ को भेजा जाए, जिसमें भविष्य का CJI शामिल न हो।” उन्होंने जल्द सुनवाई की मांग करते हुए कहा, “यह मामला अत्यंत जरूरी है… यह पहले के कई फैसलों से कवर हो चुका है।”
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इस पर CJI कांत ने कहा,
“यह बात मेरे मन में पहले से थी… मेरी स्थिति को देखते हुए इसमें हितों का टकराव हो सकता है।” उन्होंने संकेत दिया कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए मामले को दूसरी पीठ को सौंपना उचित होगा।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के तहत हुई नियुक्तियों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। याचिका में यह भी कहा गया है कि 2023 का कानून, संविधान पीठ के Anoop Baranwal फैसले के मूल आधार को बदले बिना उसे कमजोर करता है।
अदालत ने संक्षिप्त आदेश देते हुए कहा, “मामले को 7 अप्रैल, 2026 को उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।”
अब इस मामले की सुनवाई एक नई, निष्पक्ष पीठ करेगी।
Case Title: Association For Democratic Reforms v. Union of India & Dr. Jaya Thakur v. Union of India
Case Number: W.P.(C) No. 87 of 2024 & W.P.(C) No. 14 of 2024










