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धारा 498A का एक दुरुपयोग सैकड़ों असली घरेलू हिंसा मामलों को नहीं ढक सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 84) की वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि कुछ मामलों में दुरुपयोग होने से इस महत्वपूर्ण प्रावधान को रद्द नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह महिलाओं की घरेलू हिंसा से रक्षा करता है।

Shivam Y.
धारा 498A का एक दुरुपयोग सैकड़ों असली घरेलू हिंसा मामलों को नहीं ढक सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 84) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कानून के दुरुपयोग की केवल संभावना मात्र से उसे असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।

“हर एक दुरुपयोग के मामले के पीछे सैकड़ों ऐसे वास्तविक मामले हैं जहां धारा 498A पीड़ितों की रक्षा में एक महत्वपूर्ण ढाल रही है।”
— सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने माना कि इस कानून के दुरुपयोग को लेकर बढ़ती चर्चा है, लेकिन यह भी कहा कि इसे आधार बनाकर ऐसे कानून को खत्म नहीं किया जा सकता, जो वास्तव में कई पीड़ित महिलाओं को राहत देता है।

“दहेज अब भी एक गहराई तक जड़ें जमाए सामाजिक बुराई है... कई महिलाएं चुपचाप अन्याय सहने को मजबूर हैं।”
— सुप्रीम कोर्ट

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कोर्ट ने यह भी बताया कि भारत में दहेज की प्रथा अब भी व्यापक रूप से प्रचलित है और कई महिलाएं सामाजिक दबाव, डर या समर्थन की कमी के कारण मामले दर्ज नहीं करातीं। इस कारण धारा 498A जैसे प्रावधान और भी आवश्यक हो जाते हैं।

‘जनश्रुति (पीपल्स वॉयस)’ नामक संस्था द्वारा दायर जनहित याचिका में वैवाहिक मामलों में सभी पक्षों की संतुलित सुरक्षा, और धारा 498A के तहत शिकायत दर्ज करने से पहले अनिवार्य जांच की मांग की गई थी। लेकिन कोर्ट ने कानून की मंशा को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

“यह प्रावधान अनुच्छेद 15 के अनुरूप बनाया गया है, जो महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाने की अनुमति देता है।”
— सुप्रीम कोर्ट

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अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के आधार पर प्रावधान को असंवैधानिक बताने की दलील को कोर्ट ने खारिज कर दिया और कहा कि यह सकारात्मक भेदभाव के सिद्धांत के तहत लागू किया गया है।

दुरुपयोग के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा:

“दुरुपयोग पर रोक आवश्यक है, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर किसी कानून को रद्द नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों की समीक्षा एक-एक करके होनी चाहिए, न कि आम आरोपों के आधार पर।”

अंत में कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान एक संवैधानिक उद्देश्य की पूर्ति करता है और इसे हटाना उन महिलाओं के लिए नुकसानदायक होगा जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।


केस का शीर्षक: जनश्रुति (पीपुल्स वॉयस) बनाम भारत संघ और अन्य, डायरी संख्या 2152-2025

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