सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि किसी वादपत्र (plaint) को पढ़ने पर स्पष्ट रूप से लगे कि दावा कानूनन प्रतिबंधित है, तो अदालत उसे शुरुआती चरण में ही खारिज कर सकती है। अदालत ने यह टिप्पणी उस मामले में की जिसमें एक व्यक्ति ने वसीयत के आधार पर संपत्तियों पर मालिकाना हक का दावा किया था, जबकि प्रतिवादियों का कहना था कि पूरा दावा बेनामी लेनदेन पर आधारित है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला कर्नाटक की कुछ कृषि संपत्तियों से जुड़ा था। वादी ने दावा किया कि दिवंगत के. रघुनाथ ने 20 अप्रैल 2018 को एक वसीयत बनाई थी, जिसके जरिए संपत्तियां उसके नाम कर दी गई थीं। उसने अदालत से खुद को वैध मालिक घोषित करने और वसीयत में कथित त्रुटियों को सुधारने की मांग की।
दूसरी ओर, रघुनाथ की पत्नी और बच्चों ने कहा कि संपत्तियां रघुनाथ की स्वयं अर्जित संपत्ति थीं और उन्होंने पहले ही 2016 में अपनी पत्नी के पक्ष में रजिस्टर्ड वसीयत कर दी थी। उनका आरोप था कि वादी असल में यह दावा कर रहा है कि संपत्तियां उसकी रकम से खरीदी गई थीं लेकिन दूसरे व्यक्ति के नाम पर रखी गईं, जो बेनामी कानून के तहत प्रतिबंधित है।
ट्रायल कोर्ट ने आदेश VII नियम 11 सीपीसी के तहत वादपत्र खारिज कर दिया था। हालांकि, कर्नाटक हाईकोर्ट ने वह आदेश रद्द करते हुए मुकदमे को दोबारा सुनवाई के लिए बहाल कर दिया था। इसके खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
न्यायमूर्ति जे. बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि अदालत को केवल औपचारिक तरीके से नहीं, बल्कि “सार्थक और वास्तविक” तरीके से वादपत्र पढ़ना चाहिए।
पीठ ने कहा,
“यदि चतुर ड्राफ्टिंग के जरिए ऐसा भ्रम पैदा किया गया हो कि मामला सुनवाई योग्य है, जबकि वास्तव में उस पर कानून की रोक हो, तो अदालत को शुरुआत में ही हस्तक्षेप करना चाहिए।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश VII नियम 11 सीपीसी का उद्देश्य निरर्थक और कानूनन प्रतिबंधित मुकदमों को शुरुआती स्तर पर समाप्त करना है ताकि न्यायिक समय की बर्बादी न हो।
पीठ ने यह भी कहा कि यदि वादी स्वयं यह कह रहा है कि संपत्ति उसकी रकम से खरीदी गई लेकिन किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर रखी गई, तो अदालत को पूरे मामले की वास्तविक प्रकृति देखनी होगी, केवल शब्दों पर नहीं टिकना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने वादपत्र का समग्र अध्ययन कर सही निष्कर्ष निकाला था। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले के वास्तविक स्वरूप पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा वादपत्र खारिज करने का आदेश बहाल कर दिया।
Case Details
Case Title: Manjula and Others v. D.A. Srinivas
Case Number: Civil Appeal No. 7370 of 2026
Judge: Justice J. B. Pardiwala and Justice R. Mahadevan
Decision Date: May 8, 2026











