अगरतला में मंगलवार को त्रिपुरा हाईकोर्ट ने एक अहम आपराधिक अपील पर फैसला सुनाया। पत्नी की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए 76 वर्षीय व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को अदालत ने घटाकर 8 साल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला “हत्या” नहीं बल्कि “गैर इरादतन हत्या” (culpable homicide) का है।
यह फैसला न्यायमूर्ति डॉ. टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति एस. दत्ता पुरकायस्थ की खंडपीठ ने सुनाया।
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मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता श्री बीर माणिक जमातिया को गोमती जिला सत्र न्यायालय ने 12 सितंबर 2022 को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा दी थी।
मामला 17 सितंबर 2020 का है। शिकायतकर्ता ने पुलिस को बताया था कि उसके सौतेले पिता ने उसकी मां अमूल्या रानी जमातिया के सिर पर लाठी से वार कर उनकी हत्या कर दी।
जांच के दौरान पुलिस ने 19 गवाहों को पेश किया। ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयान और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को दोषी करार दिया।
बचाव पक्ष की दलीलें
अपील की सुनवाई के दौरान लीगल एड काउंसल ने कहा कि पूरा मामला कथित “अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति” (extra-judicial confession) पर आधारित है, जो कानून में कमजोर साक्ष्य माना जाता है।
उन्होंने तर्क दिया कि किसी ने घटना को अपनी आंखों से नहीं देखा। आरोपी ने पुलिस के सामने जो कथित स्वीकारोक्ति की, उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 CrPC के तहत दर्ज नहीं कराया गया।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी और मृतका के बीच पहले से घरेलू विवाद थे, लेकिन यह साबित नहीं हुआ कि हत्या की पूर्व योजना थी।
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अभियोजन का पक्ष
राज्य की ओर से लोक अभियोजक ने दलील दी कि कई गवाहों ने बताया कि घटना वाले दिन पति-पत्नी के बीच झगड़ा हुआ था।
एक गवाह ने कहा कि उसने आरोपी को घर में सोते हुए देखा और उसकी पत्नी खून से लथपथ पड़ी थी।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सिर पर चोट से मृत्यु की पुष्टि हुई। जब्त किए गए कपड़ों पर मानव रक्त भी मिला।
अभियोजन ने “लास्ट सीन थ्योरी” (आखिरी बार साथ देखे जाने का सिद्धांत) का भी हवाला दिया।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ
खंडपीठ ने विस्तार से साक्ष्यों की समीक्षा की। अदालत ने पाया कि कोई प्रत्यक्षदर्शी (eye witness) नहीं था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा, “अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति को अत्यंत सावधानी से परखा जाना चाहिए। यदि यह अन्य साक्ष्यों से पुष्ट न हो तो इस पर अकेले दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।”
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अदालत ने यह भी नोट किया कि मृतका को केवल एक ही चोट लगी थी।
पीठ ने कहा, “यदि आरोपी की हत्या की पूर्व योजना होती, तो वह एक ही वार तक सीमित नहीं रहता। रिकॉर्ड से पूर्व नियोजन (premeditation) का कोई प्रमाण नहीं मिलता।”
कोर्ट ने यह भी माना कि पति-पत्नी के बीच संबंध तनावपूर्ण थे और पहले भी झगड़े होते थे। घटना वाले दिन भी अचानक विवाद हुआ।
धारा 302 से 304 में परिवर्तन
अदालत ने कहा कि यह मामला “सडन फाइट” यानी अचानक झगड़े का प्रतीत होता है, जिसमें गुस्से में आकर एक वार किया गया।
फैसले में कहा गया, “रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने जान लेने की स्पष्ट मंशा से वार किया। इसलिए धारा 302 के तत्व पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं होते।”
इसी आधार पर अदालत ने दोषसिद्धि को धारा 302 (हत्या) से बदलकर धारा 304 भाग-I (गैर इरादतन हत्या) में परिवर्तित कर दिया।
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अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 8 वर्ष का कठोर कारावास कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी द्वारा पहले से बिताई गई हिरासत की अवधि सजा में समायोजित की जाएगी।
इसके साथ ही सत्र न्यायालय का 12 सितंबर 2022 का आदेश संशोधित कर दिया गया।
Case Title: Sri Bir Manik Jamatia vs The State of Tripura
Case No.: Crl. A (J) 55 of 2024
Decision Date: 07 January 2026










