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बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर परियोजना को लेकर प्रस्तावित तोड़फोड़ पर दायर जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वृंदावन की पवित्र गलियों और मंदिरों को तोड़े जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर यूपी सरकार से जवाब मांगा। अगली सुनवाई 3 जुलाई को होगी।

Shivam Y.
बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर परियोजना को लेकर प्रस्तावित तोड़फोड़ पर दायर जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें वृंदावन में पवित्र गलियों और मंदिरों को बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर परियोजना के लिए तोड़े जाने का विरोध किया गया है।

यह याचिका 2023 में पंकज सरस्वत द्वारा दायर की गई थी। इसमें कहा गया है कि यह विकास परियोजना वृंदावन के पारंपरिक स्वरूप को नष्ट कर देगी, जो अत्यधिक आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व रखता है। याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि ऐतिहासिक कुंज गलियों को तोड़े जाने से रोका जाए और प्राचीन मंदिरों की पहचान बनाए रखी जाए।

“कुंज गलियां केवल गलियां नहीं हैं; ये वे पवित्र स्थान हैं जहां भक्तों की आस्था है कि भगवान श्रीकृष्ण ने रासलीला की थी,” याचिका में कहा गया है।

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यह मामला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ। हाईकोर्ट ने माना कि यह विषय सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है, फिर भी उसने राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई 3 जुलाई 2025 तय की।

सुप्रीम कोर्ट में, भक्त देवेंद्र नाथ गोस्वामी और रसिक राज गोस्वामी ने 15 मई 2025 के आदेश के खिलाफ संशोधन आवेदन दायर किए हैं। उस आदेश में मंदिर के नाम पर पांच एकड़ भूमि के अधिग्रहण हेतु मंदिर निधियों के उपयोग की अनुमति दी गई थी।

संशोधन याचिकाओं में कहा गया है कि यह पुनर्विकास योजना सांस्कृतिक रूप से असंवेदनशील है और बिना भक्तों को सुने मंजूर कर दी गई।

“यह योजना मंदिर के आध्यात्मिक वातावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाएगी और संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत भक्तों के अधिकारों का उल्लंघन करती है,” याचिकाकर्ताओं ने कहा।

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हाईकोर्ट में दायर पीआईएल भी संवैधानिक मुद्दों को उठाती है। इसमें तर्क दिया गया है कि इन धार्मिक स्थलों को तोड़ना निम्नलिखित का उल्लंघन है:

“वृंदावन की ये गलियां और मंदिर वैष्णव भक्ति आंदोलन की जीवित परंपरा हैं। इनका विनाश एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक क्षति होगी,” याचिका में कहा गया।

याचिकाकर्ता ने यह भी अपील की कि भूमि अधिग्रहण में जबरदस्ती न हो और उचित मुआवजा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम 2013 के अनुसार दिया जाए।

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यह मामला, जिसका शीर्षक पंकज सरस्वत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य है, व्यापक रूप से देखा जा रहा है क्योंकि यह धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा और पवित्र स्थलों में विकास जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़ा है।

कोट (मुख्य बिंदु):

“श्री बांके बिहारी जी मंदिर के चारों ओर की पवित्र गलियों और मंदिरों को तोड़ना इस सदियों पुराने धार्मिक स्थल का अपवित्रीकरण होगा।”

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: प्रियांका मिश्रा, उत्कर्ष बिरला

प्रतिवादी के अधिवक्ता: धर्मेंद्र सिंह चौहान

अगली सुनवाई की तारीख: 3 जुलाई 2025

केस का शीर्षक - पंकज सारस्वत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य

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