बेंगलुरु में सोमवार को सुनाए गए एक अहम फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ चल रही आपराधिक मानहानि कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह साबित नहीं होता कि विज्ञापन उनके निर्देश पर प्रकाशित हुआ था या उन्होंने मानहानि की मंशा से ऐसा किया।
यह आदेश न्यायमूर्ति एस. सुनील दत्त यादव ने 17 फरवरी 2026 को पारित किया।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह शिकायत भारतीय जनता पार्टी की ओर से उसके कर्नाटक राज्य सचिव एस. केशव प्रसाद द्वारा दायर की गई थी। आरोप था कि 5 मई 2023 को प्रकाशित एक विज्ञापन में 2019 से 2023 के बीच की अवधि को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए, जिससे पार्टी और उसकी सरकार की छवि धूमिल हुई।
शिकायत में कहा गया था कि राहुल गांधी ने उस विज्ञापन को अपने ट्विटर अकाउंट पर साझा किया और इसके प्रकाशन में भूमिका निभाई। निचली अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 (मानहानि से संबंधित प्रावधान) के तहत संज्ञान लेकर समन जारी कर दिया था।
इसी समन आदेश को चुनौती देते हुए राहुल गांधी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत में क्या बहस हुई
राहुल गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विज्ञापन में उनका नाम या कोई स्पष्ट आरोप नहीं है। सिर्फ फोटो होने से यह नहीं माना जा सकता कि विज्ञापन उनके निर्देश पर प्रकाशित हुआ।
उन्होंने यह भी कहा कि जिस ट्वीट का जिक्र शिकायत में है, उसे मजिस्ट्रेट के सामने साक्ष्य के रूप में पेश ही नहीं किया गया और न ही सूचना प्रौद्योगिकी कानून के अनुसार 65-बी प्रमाणपत्र लगाया गया।
दूसरी ओर, भाजपा की ओर से दलील दी गई कि राजनीतिक दल भी “व्यक्ति” की परिभाषा में आते हैं और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला कोई भी प्रकाशन मानहानि हो सकता है। वकील ने कहा, “प्रक्रिया जारी करने के चरण पर केवल प्रथम दृष्टया संतुष्टि पर्याप्त होती है।”
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‘पीड़ित व्यक्ति’ कौन? अदालत की अहम टिप्पणी
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इस सवाल पर था कि क्या शिकायतकर्ता ‘पीड़ित व्यक्ति’ (aggrieved person) माना जा सकता है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मानहानि का मामला केवल वही व्यक्ति या संस्था दायर कर सकती है, जिसे सीधा नुकसान हुआ हो।
न्यायालय ने पाया कि शिकायत राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के नाम से दायर की गई, लेकिन अधिकृत पत्र राज्य इकाई के अध्यक्ष द्वारा जारी किया गया था। अदालत ने स्पष्ट कहा, “राष्ट्रीय पार्टी की ओर से मुकदमा दायर करने के लिए विधिवत अधिकृत प्रतिनिधि होना आवश्यक है।”
इस आधार पर अदालत ने माना कि शिकायत विधिसम्मत तरीके से अधिकृत नहीं थी।
विज्ञापन और ‘मंशा’ का सवाल
न्यायमूर्ति यादव ने कहा कि किसी व्यक्ति पर आपराधिक मानहानि का आरोप लगाने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि उसने जानबूझकर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने की मंशा से काम किया हो।
अदालत ने टिप्पणी की, “केवल फोटो का होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं कि विज्ञापन आरोपी के निर्देश पर प्रकाशित हुआ।”
ट्वीट के संबंध में अदालत ने पाया कि वह रिकॉर्ड पर विधिवत प्रदर्शित नहीं था। आदेश में कहा गया, “जब समन जारी किया गया, उस समय रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सामग्री नहीं थी जो आरोपी नंबर-4 को विज्ञापन से जोड़ती हो।”
प्रक्रिया में कमी
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी अदालत के क्षेत्राधिकार से बाहर रहते हैं, ऐसे में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 202 के तहत प्रारंभिक जांच आवश्यक थी।
न्यायालय ने कहा कि इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जिससे आरोपी को अनावश्यक मुकदमेबाजी में घसीटा गया।
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अंतिम फैसला
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश पर्याप्त आधार के बिना पारित किया गया था।
अदालत ने कहा, “ऐसी कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।”
इसी के साथ, सी.सी. नंबर 7399/2024 में राहुल गांधी (आरोपी नंबर-4) के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया गया ।
Case Title: Rahul Gandhi vs Bharatiya Janata Party
Case No.: Criminal Petition No. 14473 of 2024
Decision Date: 17 February 2026









