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बरी के खिलाफ बार-बार अपील नहीं: केरल हाईकोर्ट ने पीड़ित की दूसरी अपील पर लगाई रोक

गोपाला कृष्णन बनाम केरल राज्य और अन्य - केरल उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि पीड़ित को बीएनएसएस के तहत बरी होने के खिलाफ अपील करने का केवल एक ही अधिकार है; दूसरी आपराधिक अपील सुनवाई योग्य नहीं है।

Shivam Y.
बरी के खिलाफ बार-बार अपील नहीं: केरल हाईकोर्ट ने पीड़ित की दूसरी अपील पर लगाई रोक

केरल हाईकोर्ट ने एक अहम सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि पीड़ित (शिकायतकर्ता) को बरी किए जाने के खिलाफ केवल एक बार ही अपील करने का अधिकार है। यदि वह अधिकार पहले ही इस्तेमाल कर लिया गया है, तो उसी व्यक्ति द्वारा दूसरी अपील दाखिल नहीं की जा सकती।

यह फैसला केरल हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति बेच्चू कुरियन थॉमस ने दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वायनाड जिले से जुड़ा है, जहां एक व्यक्ति ने धोखाधड़ी, अवैध धन उधार और चिट फंड कानून के उल्लंघन जैसे आरोपों को लेकर आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी।

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निचली अदालत (न्यायिक मजिस्ट्रेट) ने आरोपियों को बरी कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने सेशंस कोर्ट में अपील दायर की, लेकिन वहां भी निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा गया।

इसके बावजूद, शिकायतकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत हाईकोर्ट में एक और अपील करने की अनुमति (लीव) मांगी। यहीं से कानूनी विवाद खड़ा हुआ।

कानूनी सवाल क्या था

हाईकोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था:

क्या कोई पीड़ित, जिसने पहले ही सेशंस कोर्ट में बरी के खिलाफ अपील कर ली हो, उसी बरी के आदेश की पुष्टि होने के बाद हाईकोर्ट में दूसरी अपील कर सकता है?

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याचिकाकर्ता की दलील

शिकायतकर्ता की ओर से दलील दी गई कि BNSS की धारा 413 और 419(4) को साथ पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि पीड़ित को किसी भी बरी के आदेश के खिलाफ अपील का अधिकार है, चाहे वह ट्रायल कोर्ट का हो या अपीलीय अदालत का।

वकील ने कहा कि कानून पीड़ित को व्यापक अधिकार देता है और दूसरी अपील पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

कोर्ट द्वारा नियुक्त अमाइकस क्यूरी ने इस तर्क का विरोध किया। उन्होंने कहा कि
अपील कोई स्वाभाविक अधिकार नहीं है, बल्कि कानून द्वारा दिया गया सीमित अधिकार है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि एक ही व्यक्ति को एक ही मामले में एक ही बार अपील का अवसर मिलता है।

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अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति बेच्चू कुरियन थॉमस ने विस्तार से कानून की व्याख्या करते हुए कहा:

“अपील का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है, और कानून इसे जितनी सीमा तक देता है, उससे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि:

  • BNSS की धारा 413 पीड़ित को एक अपील का अधिकार देती है, न कि कई अपीलों का।
  • यदि ट्रायल कोर्ट के बरी आदेश के खिलाफ सेशंस कोर्ट में अपील की जा चुकी है, तो उसी शिकायतकर्ता द्वारा हाईकोर्ट में दूसरी अपील कानूनी रूप से अस्वीकार्य है।
  • दूसरी अपील की अनुमति देना, कानून की संरचना के खिलाफ होगा।

हालांकि अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि ट्रायल कोर्ट ने सजा दी हो और बाद में सेशंस कोर्ट ने आरोपी को बरी किया हो, तो उस स्थिति में पीड़ित को हाईकोर्ट में अपील का अधिकार मिल सकता है, क्योंकि वह पहली बार बरी का आदेश होगा।

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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि पीड़ित का अपीलीय अधिकार एक स्तर तक सीमित है और उसे “दूसरी अपील” के रूप में नहीं बदला जा सकता।

अंतिम निर्णय

कोर्ट ने कहा कि:

  • शिकायतकर्ता पहले ही सेशंस कोर्ट में अपील कर चुका है।
  • इसलिए हाईकोर्ट में दूसरी अपील सुनवाई योग्य नहीं है।
  • रजिस्ट्री द्वारा बताई गई आपत्ति सही है और उसे बरकरार रखा जाता है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को प्रमाणित प्रति वापस की जाए।

Case Title: Gopala Krishnan v. State of Kerala & Others

Case Number: Unnumbered Crl.L.P. (Filing No. 366 of 2025)

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