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योग्यता का बहाना नहीं चलेगा: पत्नी और बेटे के भरण-पोषण मामले में उच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश

श्रीमती सुमन वर्मा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए, पत्नी को शिक्षित होने के बावजूद भरण-पोषण का हकदार माना और धारा 125 सीआरपीसी के तहत नए सिरे से मूल्यांकन का आदेश दिया।

Shivam Y.
योग्यता का बहाना नहीं चलेगा: पत्नी और बेटे के भरण-पोषण मामले में उच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कहा है कि पत्नी की शैक्षणिक योग्यता या काम करने की क्षमता मात्र के आधार पर उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था और केवल नाबालिग बेटे के लिए मामूली राशि तय की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सुमन वर्मा और उनके पति के बीच लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों की शादी वर्ष 2006 में हिंदू रीति-रिवाज़ से हुई थी। एक बेटा, मास्टर तिलक वर्मा, इस विवाह से जन्मा। पत्नी का आरोप था कि उसे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के बाद बेटे सहित घर से निकाल दिया गया।

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पति ने दावा किया कि पत्नी स्वयं अलग रह रही है और वह पढ़ी-लिखी होने के कारण अपना गुज़ारा कर सकती है। फैमिली कोर्ट ने इसी आधार पर पत्नी की भरण-पोषण याचिका खारिज कर दी थी और बेटे के लिए केवल ₹3,000 प्रति माह तय किए थे।

कोर्ट की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने फैमिली कोर्ट की सोच पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि केवल यह तथ्य कि पत्नी शिक्षित है या उसके पास काम करने की क्षमता है, अपने-आप में भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।

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पीठ ने टिप्पणी की,

“सिर्फ योग्यता या संभावित कमाई से यह नहीं माना जा सकता कि पत्नी अपने जीवन स्तर को स्वयं बनाए रख सकती है।”

अदालत ने यह भी कहा कि पति द्वारा नाबालिग बेटे की पितृत्व से इनकार करना उसकी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश को दर्शाता है। इसके अलावा, बेटे को दी गई ₹3,000 की राशि को अदालत ने “किशोर बच्चे की ज़रूरतों के लिहाज़ से बेहद अपर्याप्त” बताया।

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हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि भरण-पोषण का उद्देश्य केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना है। अदालत ने कहा कि “भरण-पोषण सामाजिक न्याय का उपाय है, न कि दया का विषय।”

अदालत का फैसला

अंततः अदालत ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मामले को दोबारा विचार के लिए वापस भेज दिया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट एक महीने के भीतर नए सिरे से, सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, पत्नी और नाबालिग बेटे दोनों के भरण-पोषण पर निर्णय दे।

इस प्रकार, अदालत ने स्पष्ट किया कि पति की कानूनी ज़िम्मेदारी केवल बच्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि पत्नी के सम्मानजनक जीवन निर्वाह तक फैली हुई है।

Case Title: Smt. Suman Verma and Another vs State of Uttar Pradesh and Another

Case Number: Criminal Revision No. 5971 of 2024

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