गुजरात हाईकोर्ट ने 14 साल 6 माह की एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को 15 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने कहा कि पीड़िता के “सर्वोत्तम हित” और उसके मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए गर्भसमापन की इजाजत दी जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति एम. आर. मेंगडेय की एकल पीठ ने 2 फरवरी 2026 को यह आदेश पारित किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका नाबालिग पीड़िता की ओर से दायर की गई थी। पीड़िता के साथ कथित रूप से दुष्कर्म हुआ था और इसी घटना के कारण वह गर्भवती हुई। इस संबंध में दाहोद जिले के धनपुर पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 137(2) और 87 के तहत प्राथमिकी दर्ज है।
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याचिका में कहा गया कि पीड़िता की उम्र महज 14 वर्ष है और गर्भ को जारी रखना उसके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। अदालत से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम, 1971 के तहत गर्भसमापन की अनुमति मांगी गई।
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट
अदालत ने पहले सिविल अस्पताल, दाहोद को विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर पीड़िता की जांच करने का निर्देश दिया था। बाद में रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता लगभग 15 सप्ताह की गर्भवती है। स्त्रीरोग विशेषज्ञ, मनोचिकित्सक, रेडियोलॉजिस्ट और अन्य चिकित्सकों ने संयुक्त राय में कहा कि एमटीपी अधिनियम के प्रावधानों के तहत गर्भसमापन संभव है।
पीठ ने रिपोर्ट पर गौर करते हुए कहा कि मेडिकल बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि कानून के अनुसार गर्भसमापन किया जा सकता है।
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अदालत की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख किया। विशेष रूप से, ‘X बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का हवाला दिया गया जिसमें कहा गया था कि बलात्कार से उत्पन्न गर्भावस्था को महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर आघात माना जाता है।
पीठ ने कहा, “कानून महिला की शारीरिक स्वायत्तता और उसकी गरिमा का सम्मान करता है।”
अदालत ने यह भी माना कि नाबालिग पीड़िता को इस अवस्था में मातृत्व का बोझ उठाने के लिए बाध्य करना उसके अधिकारों के विरुद्ध होगा। आदेश में कहा गया कि मानसिक आघात, सामाजिक परिस्थितियां और उम्र-इन सभी पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
राज्य का पक्ष
राज्य की ओर से उपस्थित अतिरिक्त लोक अभियोजक ने अदालत से अनुरोध किया कि यदि गर्भसमापन की अनुमति दी जाए तो भ्रूण के ऊतक (tissue) डीएनए जांच के लिए सुरक्षित रखे जाएं।
अदालत ने इस आग्रह को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि वैज्ञानिक तरीके से नमूने लेकर जांच अधिकारी को सौंपे जाएं।
पीठ ने कहा, “मैं प्रथम दृष्टया आरोपित आदेशों के अंतर्गत आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं हूं।”
अदालत का अंतिम निर्णय
अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता की गर्भावस्था 15 सप्ताह से अधिक है, इसलिए प्रक्रिया विशेषज्ञ टीम की निगरानी में की जानी चाहिए।
पीठ ने निर्देश दिया कि दाहोद स्थित ज़ायडस मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के तीन वरिष्ठ स्त्रीरोग विशेषज्ञ और एक मनोवैज्ञानिक पीड़िता की जांच करें और यदि सभी डॉक्टर सहमत हों कि प्रक्रिया सुरक्षित है, तो तत्काल गर्भसमापन किया जाए।
अदालत ने कहा, “प्रत्येक दिन की देरी पीड़िता की पीड़ा को बढ़ाएगी।”
साथ ही, आदेश दिया गया कि:
- अस्पताल आवश्यक प्री और पोस्ट-टर्मिनेशन देखभाल सुनिश्चित करे।
- यदि जन्म के समय शिशु जीवित हो, तो उसे सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधा दी जाए।
- यदि पीड़िता शिशु की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती, तो राज्य बाल संरक्षण कानूनों के तहत उसकी देखभाल करेगा।
- डीएनए सैंपल सुरक्षित रखकर जांच अधिकारी को सौंपे जाएं।
इन निर्देशों के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।
Case Title: ABC vs State of Gujarat & Ors.
Case No.: R/Special Criminal Application No. 1205 of 2026
Decision Date: 02 February 2026









