मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि औद्योगिक उद्देश्य के लिए आवंटित जमीन का उपयोग तय परियोजना के लिए नहीं किया जाता, तो राज्य औद्योगिक विकास एजेंसी को वह जमीन वापस लेने का अधिकार है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में केवल प्लॉट डिपॉजिट की वापसी का दावा किया जा सकता है, लेकिन विकास शुल्क जैसे अन्य भुगतान वापस नहीं मिलेंगे।
कोर्ट ने Kems Forging Ltd. की ओर से दायर रिट अपील को खारिज करते हुए एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखा।
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मामले की पृष्ठभूमि
रिकॉर्ड के अनुसार, कंपनी को 05 दिसंबर 2005 को तमिलनाडु के औद्योगिक क्षेत्र में एक प्लॉट आवंटित किया गया था। इसके बाद 02 मार्च 2006 को कंपनी और राज्य उद्योग प्रोत्साहन निगम (SIPCOT) के बीच लीज डीड पर हस्ताक्षर हुए।
लीज समझौते की क्लॉज 14(i) में साफ लिखा था कि यदि आवंटित जमीन का उपयोग तय औद्योगिक उद्देश्य के लिए नहीं किया जाता या जरूरत से अधिक जमीन पाई जाती है, तो SIPCOT उस हिस्से का आवंटन रद्द कर सकता है और जमीन को वापस ले सकता है।
बाद में अधिकारियों ने पाया कि प्लॉट नंबर E-12 में से 3.70 एकड़ जमीन लंबे समय तक उपयोग में नहीं लाई गई। इसके बाद SIPCOT ने कंपनी को नोटिस देकर कहा कि वह इस अतिरिक्त जमीन को 15 मई 2012 तक सरेंडर करे और सरेंडर डीड पर हस्ताक्षर करे।
कंपनी ने इस निर्देश का पालन नहीं किया, जिसके बाद 25 मार्च 2012 को SIPCOT ने उक्त जमीन का आवंटन रद्द कर उसे वापस लेने का आदेश जारी कर दिया।
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कंपनी की दलील
अपीलकर्ता कंपनी की ओर से यह तर्क दिया गया कि विवादित जमीन पर सोलर पैनल लगाए गए हैं, जिससे यह साबित होता है कि जमीन का उपयोग किया जा रहा है।
कंपनी के वकील ने अदालत के सामने एक फोटो भी प्रस्तुत किया, जिसमें सोलर पैनल दिखाई दे रहे थे।
कोर्ट की टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने कंपनी की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जमीन विशेष रूप से फोर्ज्ड और मशीन किए गए ऑटो कंपोनेंट्स के निर्माण के लिए औद्योगिक इकाई स्थापित करने के उद्देश्य से दी गई थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सोलर पैनल लगाना उस औद्योगिक परियोजना के अनुरूप उपयोग नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा:
“लीज डीड की क्लॉज 14(i) स्पष्ट रूप से कहती है कि जमीन उसी उद्देश्य के लिए उपयोग होनी चाहिए जिसके लिए उसे आवंटित किया गया है। यदि ऐसा नहीं होता, तो प्राधिकरण अतिरिक्त जमीन को वापस लेने का अधिकार रखता है।”
कोर्ट ने यह भी माना कि कंपनी ने लीज समझौते की शर्तों को स्वीकार किया था, इसलिए उन शर्तों का पालन करना अनिवार्य था।
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एकल न्यायाधीश के आदेश पर अदालत की राय
बेंच ने कहा कि एकल न्यायाधीश ने मामले के तथ्यों और लीज डीड की शर्तों का सही ढंग से परीक्षण किया था।
एकल न्यायाधीश ने SIPCOT की कार्रवाई को वैध मानते हुए यह भी निर्देश दिया था कि क्लॉज 14(i) के अनुसार कंपनी को केवल प्लॉट डिपॉजिट की राशि वापस की जाए।
डिवीजन बेंच ने पाया कि इस आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।
फैसला
अदालत ने कहा कि SIPCOT द्वारा अतिरिक्त और अनुपयोगी जमीन वापस लेने की कार्रवाई लीज डीड की शर्तों के अनुरूप है।
इसी आधार पर मद्रास हाईकोर्ट ने रिट अपील खारिज करते हुए एकल न्यायाधीश के आदेश की पुष्टि कर दी। साथ ही संबंधित याचिका को भी बंद कर दिया गया।
Case Title: Kems Forging Ltd. vs State Industries Promotion Corporation of Tamil Nadu Ltd.
Case No.: W.A. No. 2295 of 2022
Decision Date: 02 March 2026









