दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की कोर्ट नंबर में गहरी खामोशी थी जब जस्टिस मेहता ने फैसला पढ़ना शुरू किया। मामला मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में 2003 में हुई एक हिंसक घटना से जुड़ा था, जिसमें भग्गू उर्फ भगचंद की मौत हो गई थी। सवाल यह था - क्या यह हत्या थी या गैर-इरादतन हत्या?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए साफ कहा कि यह मामला हत्या का है, न कि केवल ‘कुलपेबल होमिसाइड’ (गैर-इरादतन हत्या) का।
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मामले की पृष्ठभूमि
11 जुलाई 2003 की शाम। भतेरा घाट से लौट रही एक मिनी बस का रास्ता ट्यूबवेल के पाइप रखकर रोका गया। बस में सवार भग्गू और अन्य लोगों पर लाठियों से हमला हुआ।
एफआईआर दर्ज हुई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कुल 29 चोटें दर्ज की गईं, जिनमें सिर पर कई गहरी और हड्डी तक पहुंचने वाली चोटें शामिल थीं।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को धारा 302/149 आईपीसी (सामूहिक इरादे से हत्या) के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
लेकिन मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 2010 में सजा कम करते हुए इसे धारा 304 भाग-II (ऐसा कृत्य जिसमें मौत की संभावना का ज्ञान हो, पर हत्या का स्पष्ट इरादा न हो) में बदल दिया और सजा छह साल कर दी।
सर्वोच्च न्यायालय का अवलोकन
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का विस्तार से परीक्षण किया।
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पीठ ने कहा कि:
“सिर पर बार-बार लाठी से गहरे वार किए गए। यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपियों को यह ज्ञान नहीं था कि ऐसे वार मौत का कारण बन सकते हैं।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि रास्ता पहले से रोककर घात लगाकर हमला किया गया। यह अचानक हुई झड़प नहीं थी।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट (Exh. P/8) को आरोपियों ने ट्रायल में स्वीकार किया था। इसलिए डॉक्टर की गवाही न होने के बावजूद रिपोर्ट को ठोस साक्ष्य माना गया।
पीठ ने स्पष्ट किया:
“जब कई लोग मिलकर जानलेवा हमला करते हैं और सिर जैसे संवेदनशील हिस्से पर गहरे वार करते हैं, तो हत्या का इरादा या कम से कम ऐसी चोट पहुंचाने का इरादा सिद्ध होता है जो सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बन सकती है।”
Section 149 IPC पर अदालत की टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि जब अवैध जमावड़ा (Unlawful Assembly) सिद्ध हो जाए और हमला सामूहिक उद्देश्य से किया गया हो, तो यह जरूरी नहीं कि किस आरोपी ने अंतिम वार किया।
“धारा 149 आईपीसी सामूहिक जिम्मेदारी तय करती है। अगर अपराध साझा उद्देश्य से हुआ है, तो हर सदस्य जिम्मेदार है।”
हाईकोर्ट का यह तर्क कि केवल एक घातक चोट थी, सुप्रीम कोर्ट को स्वीकार्य नहीं हुआ। पीठ ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट से साफ है कि सिर पर कई गहरी चोटें थीं और मौत को एक अकेले वार तक सीमित नहीं किया जा सकता।
रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि उसी दिन दोपहर में मृतक ने एक विवाद में हस्तक्षेप किया था। कोर्ट ने माना कि यह घटना हमले का तत्काल कारण बनी।
रास्ता रोकना, घात लगाकर इंतजार करना और फिर सामूहिक हमला - इन परिस्थितियों ने अदालत को यह निष्कर्ष निकालने में मदद की कि हमला योजनाबद्ध था।
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अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा बहाल कर दी।
आरोपियों को धारा 302/149 आईपीसी के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा फिर से लागू कर दी गई।
मामला यहीं समाप्त हुआ - हत्या की सजा बहाल, छह साल की सजा का आदेश निरस्त।
Case Title: Sitaram Kuchhbedia vs Vimal Rana & Others
Case No.: Criminal Appeal Nos. 1837-38 of 2011 (with 1835-36 of 2011)
Decision Date: February 23, 2026










