मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में दो नाबालिग बेटियों की अभिरक्षा (कस्टडी) माँ के पास बनाए रखने के परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि बच्चों के हित सर्वोपरि हैं और उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि वे अपनी माँ के साथ सुरक्षित और उचित वातावरण में रह रही हैं।
यह आदेश न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने 5 मार्च 2026 को पारित किया। अदालत ने पिता वासुदेव डांगी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए कहा कि परिवार न्यायालय के आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वासुदेव डांगी और उनकी पत्नी स्म्ति पुष्पा बाई के बीच नाबालिग बेटियों की कस्टडी को लेकर विवाद से जुड़ा है। दोनों की शादी वर्ष 2010 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी और उनसे दो बेटियां हुईं, जिनकी उम्र लगभग 10 वर्ष और 6 वर्ष है।
परिवार न्यायालय, मंदसौर में पति ने अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम, 1890 की धारा 7 के तहत बच्चों की अभिरक्षा पाने के लिए आवेदन दायर किया था।
हालांकि, 19 जनवरी 2026 को परिवार न्यायालय ने यह आवेदन खारिज कर दिया और बच्चों की कस्टडी माँ को ही सौंप दी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए पिता ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
पिता की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि पत्नी ने 4 मार्च 2025 को सत्यानारायण डांगी नामक व्यक्ति से ‘नाता’ प्रथा के माध्यम से दूसरा विवाह कर लिया है और वह उसी के साथ बच्चों को लेकर रह रही है।
अपीलकर्ता के वकील ने यह भी कहा कि इस स्थिति में बच्चों की कस्टडी पिता को दी जानी चाहिए।
वहीं, माँ की ओर से यह कहा गया कि बच्चों की देखभाल ठीक प्रकार से की जा रही है और उनकी पढ़ाई भी जारी है।
हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के रिकॉर्ड और साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि नाबालिग बच्चियों के हित को सबसे महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।
अदालत ने नोट किया कि रिकॉर्ड में यह आरोप भी सामने आया है कि पिता को पुत्र की इच्छा थी और इसी कारण पत्नी को प्रताड़ित किया जाता था। साथ ही उनके किसी अन्य महिला से अवैध संबंध होने के आरोप भी लगाए गए थे।
न्यायालय ने यह भी देखा कि दोनों बच्चियां वर्तमान में अपनी माँ के साथ रह रही हैं, स्कूल जा रही हैं और उनकी देखभाल उचित तरीके से की जा रही है।
इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि बच्चियों को पिता के पास भेजना उनके हित में नहीं होगा।
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिवार न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश सही और कानून के अनुरूप है।
अदालत ने कहा कि कस्टडी माँ के पास ही रहना बच्चों के हित में है, इसलिए पिता की अपील में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
हालांकि, सुनवाई के दौरान पिता के वकील ने यह शिकायत भी की कि उन्हें परिवार न्यायालय द्वारा दिए गए विजिटेशन राइट्स का लाभ नहीं मिल रहा है।
इस पर अदालत ने उन्हें यह स्वतंत्रता दी कि यदि ऐसी समस्या है तो वे परिवार न्यायालय से उचित राहत मांग सकते हैं।
इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और मामले में किसी भी प्रकार की लागत नहीं लगाई।
Case Title: Vasudev Dangi v. Smt. Pushpa Bai
Case Number: Miscellaneous Appeal No. 1488 of 2026
Decision Date: March 5, 2026









