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राजस्थान हाईकोर्ट ने रेलवे की अपील खारिज की, उर्वरक क्षति मामले में ₹9.93 लाख मुआवजा बरकरार

भारत संघ बनाम गुजरात राज्य उर्वरक और रसायन लिमिटेड। राजस्थान हाईकोर्ट ने रेलवे की अपील खारिज कर उर्वरक क्षति मामले में ₹9.93 लाख मुआवजा बरकरार रखा, रेलवे लापरवाही साबित।

Vivek G.
राजस्थान हाईकोर्ट ने रेलवे की अपील खारिज की, उर्वरक क्षति मामले में ₹9.93 लाख मुआवजा बरकरार

जयपुर बेंच में शुक्रवार को एक पुराने वाणिज्यिक विवाद पर अहम फैसला आया। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि माल रेल जोखिम पर बुक हो तो उसकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी रेलवे की होती है।

न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंध ने रेलवे प्रशासन की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती दी गई थी। ट्रिब्यूनल ने उर्वरक कंपनी के पक्ष में ₹9,93,000 मुआवजा 9% वार्षिक ब्याज के साथ देने का आदेश दिया था।

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मामले की पृष्ठभूमि

रिकॉर्ड के अनुसार, गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर एंड केमिकल लिमिटेड ने सितंबर 1999 में 51,756 एचडीपीई बैग डीएपी उर्वरक रेलवे के जरिए मोती खावड़ी से गंगापुर सिटी भेजे थे। यह बुकिंग छह रेलवे रसीदों के तहत “रेलवे जोखिम” पर की गई थी।

कंपनी का आरोप था कि जब माल 20 सितंबर 1999 को गंगापुर सिटी पहुंचा, तो वैगनों को खुले में खड़ा किया गया। वहां ढका हुआ शेड नहीं था। उतारने के बाद बोरियां कच्ची और असमान जगह पर रखी गईं, जो मालगोदाम से भी दूर थी।

बारिश होने से बोरियां भीग गईं और माल खराब हो गया। कंपनी ने संयुक्त निरीक्षण (जॉइंट असेसमेंट) और पंचनामा की मांग की, लेकिन रेलवे ने यह प्रक्रिया पूरी नहीं की। इसके बाद मामला रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल पहुंचा।

ट्रिब्यूनल ने सभी मुद्दों पर विचार करते हुए रेलवे को लापरवाही का दोषी माना और मुआवजा देने का आदेश दिया।

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हाईकोर्ट में रेलवे की ओर से दलील दी गई कि माल समय पर पहुंचा था और देरी नहीं हुई। वकील ने कहा कि बोरियां खुद कंपनी ने बिना किसी टिप्पणी के उतारीं और हस्ताक्षर कर डिलीवरी ले ली।

रेलवे का तर्क था कि यदि बाद में बारिश से नुकसान हुआ, तो उसकी जिम्मेदारी रेलवे पर नहीं डाली जा सकती।

अदालत की टिप्पणियां

अदालत ने रिकॉर्ड का गहन अध्ययन किया। न्यायमूर्ति धंध ने कहा कि रेलवे यह साबित करने में असफल रहा कि डिलीवरी के बाद माल पूरी तरह कंपनी के कब्जे में चला गया था।

फैसले में उल्लेख है कि रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 93 के तहत, ट्रांजिट के दौरान या डिलीवरी तक हुए नुकसान की जिम्मेदारी रेलवे प्रशासन की होती है।

अदालत ने कहा, “रेलवे पर यह भार था कि वह यह सिद्ध करे कि उसने माल की सुरक्षा के लिए उचित सावधानी बरती, परंतु ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।”

कोर्ट ने यह भी माना कि यदि स्टेशन पर ढका हुआ शेड उपलब्ध नहीं था, तो रेलवे को कम से कम पर्याप्त तिरपाल उपलब्ध कराना चाहिए था। खुले में रखे माल की सुरक्षा न करना लापरवाही दर्शाता है।

अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि रेलवे रसीद पर यह टिप्पणी कि ‘लोडिंग की निगरानी रेलवे ने नहीं की’, उसे जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकती।

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हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने सभी तथ्यों और दस्तावेजों पर विचार कर निष्कर्ष निकाला था। यह एक तथ्यात्मक निष्कर्ष था और उसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं थी।

न्यायालय ने कहा कि रेलवे यह साबित नहीं कर सका कि संबंधित दिन बारिश नहीं हुई थी या माल “कंपनी के जोखिम” पर बुक किया गया था। उपलब्ध रसीदों से स्पष्ट था कि बुकिंग रेलवे जोखिम पर थी।

अंतिम निर्णय

अदालत ने कहा कि अपील में कोई दम नहीं है और ट्रिब्यूनल के आदेश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

इस प्रकार, सिविल मिसलेनियस अपील खारिज कर दी गई। ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया ₹9,93,000 का मुआवजा और 9% वार्षिक ब्याज का आदेश बरकरार रखा गया।

Case Title: Union of India vs. Gujarat State Fertilizer and Chemical Ltd.

Case No.: S.B. Civil Miscellaneous Appeal No. 4253/2012

Decision Date: 23/01/2026

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