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धारा 107 बीएनएसएस: केरल हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस मजिस्ट्रेट की मंजूरी के बिना बैंक खाते फ्रीज नहीं कर सकती

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि बीएनएसएस, 2023 की धारा 107 के तहत मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस बैंक खाते को अटैच या फ्रीज नहीं कर सकती। विस्तृत कानूनी विवरण।

Shivam Y.
धारा 107 बीएनएसएस: केरल हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस मजिस्ट्रेट की मंजूरी के बिना बैंक खाते फ्रीज नहीं कर सकती

केरल हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि भारत नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita - BNSS), 2023 की धारा 107 के अंतर्गत, किसी भी बैंक खाते को केवल संबंधित मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद ही संलग्न किया जा सकता है। पुलिस एकतरफा रूप से ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती, चाहे वे धनराशि को अपराध की आय (proceeds of crime) मानते हों।

यह फैसला न्यायमूर्ति वी. जी. अरुण ने हेडस्टार ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड बनाम राज्य केरल और अन्य (Crl.M.C. No. 3740 of 2025) मामले में सुनाया, जिसमें याचिकाकर्ता ने पुलिस द्वारा उसके बैंक खाते को मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना फ्रीज़ करने की कार्यवाही को चुनौती दी थी।

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यह मामला Apple Middle East General Trading LLC की शिकायत से जुड़ा था, जिसने शुगर निर्यात के लिए Spezia Organic Condiments Pvt. Ltd. को ₹49.53 लाख अग्रिम भुगतान किया था। कथित रूप से, यह माल सरकारी नीति परिवर्तन के चलते कभी निर्यात नहीं हुआ और राशि Headstar Trading LLP के माध्यम से याचिकाकर्ता के खाते में स्थानांतरित की गई।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह हस्तांतरण व्यवसाय की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा था और इसमें कोई आपराधिक मंशा नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि BNSS की धाराओं 94 और 106 के तहत पुलिस को ऐसे खातों को फ्रीज़ करने का अधिकार नहीं है जब तक कि संपत्ति चोरी की न हो या अपराध होने का संदेह स्पष्ट न हो। धारा 107, जो अपराध की आय की संलग्नता को नियंत्रित करती है, मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक बनाती है।

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“धारा 107 बीएनएसएस के अनुसार, किसी अपराध की जांच कर रहा पुलिस अधिकारी केवल मजिस्ट्रेट से अनुमति प्राप्त कर संपत्ति को संलग्न कर सकता है, यदि उसे विश्वास हो कि वह संपत्ति सीधे या परोक्ष रूप से आपराधिक गतिविधियों से प्राप्त है।” — केरल हाईकोर्ट

अदालत ने धारा 106 के तहत "सीज़र" (seizure) और धारा 107 के तहत "संलग्नता" (attachment) के बीच अंतर को स्पष्ट किया। सीज़र केवल साक्ष्य को सुरक्षित करने के लिए होता है और इसे पुलिस अधिकारी कर सकता है, जबकि संलग्नता केवल मजिस्ट्रेट के आदेश से ही की जा सकती है।

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“इस अंतर का कारण यह है कि सीज़र का उद्देश्य जांच के दौरान साक्ष्य को सुरक्षित करना होता है, जबकि संलग्नता का उद्देश्य अपराध से प्राप्त संपत्ति को नष्ट होने से बचाना और कानूनी प्रक्रिया जैसे जब्ती व पीड़ितों को वितरण के लिए सुरक्षित करना होता है।” — केरल हाईकोर्ट

न्यायमूर्ति अरुण ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता के खाते में जो राशि है वह अपराध की आय है, तब भी उसे केवल धारा 107 में वर्णित प्रक्रिया के माध्यम से ही संलग्न किया जा सकता है जिसमें नोटिस, सुनवाई और मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश शामिल हैं।

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अंततः, हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता के खाते से डेबिट फ्रीज़ हटाने का आदेश दिया। साथ ही यह स्पष्ट किया कि यदि पुलिस इस खाते को संलग्न करना चाहती है तो वह मजिस्ट्रेट के समक्ष उचित प्रक्रिया के अनुसार आवेदन कर सकती है।

“यदि ऐसा है, तो राशि को केवल धारा 107 बीएनएसएस में वर्णित प्रक्रिया का पालन कर संलग्न किया जा सकता है या खाता फ्रीज़ किया जा सकता है।” — न्यायमूर्ति वी. जी. अरुण

केस का शीर्षक: हेडस्टार ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड बनाम केरल राज्य और अन्य

केस नं.: 2025 का सीआरएल.एमसी नं. 3740

याचिकाकर्ता के वकील अधिवक्ता श्री बाबू एस. नायर

प्रतिवादी के वकील: अधिवक्ता श्री सरथकुमार.टी.एस., श्रीमती जिस्ममोल जेम्स, श्री श्याम कुमार एम.पी., श्री अचनकुंजू पी.सी., श्री रोनी वी.पी., श्रीमती विष्णुजा वासुदेवन

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