राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि माता-पिता के तलाक के बावजूद बेटा मृत सरकारी कर्मचारी का “आश्रित” माना जाएगा और उसे करुणामूलक नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज करते हुए एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा।
यह फैसला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने 25 फरवरी 2026 को सुनाया।
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मामले की पृष्ठभूमि
मामला उस आवेदन से जुड़ा था जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने पिता की मृत्यु के बाद करुणामूलक नियुक्ति की मांग की थी। रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता के पिता की मृत्यु 2006 में हुई थी और बेटे ने निर्धारित समय सीमा के भीतर 6 नवंबर 2006 को नियुक्ति के लिए आवेदन दे दिया था।
हालांकि विभाग ने उससे पहले उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) लाने को कहा। याचिकाकर्ता ने बाद में प्रमाण पत्र प्राप्त भी कर लिया, लेकिन इसके बावजूद उसकी नियुक्ति पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।
इस देरी और नियुक्ति न मिलने से परेशान होकर उसने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। जनवरी 2017 में एकल पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए उसके पक्ष में आदेश दिया था।
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राज्य सरकार की दलील
राज्य सरकार ने एकल पीठ के आदेश को चुनौती देते हुए दलील दी कि याचिकाकर्ता अपने माता-पिता के तलाक के बाद अपनी मां के साथ रह रहा था।
सरकार के अनुसार,
“माता-पिता के तलाक के बाद वह अपने पिता पर आश्रित नहीं रहा, इसलिए करुणामूलक नियुक्ति का हकदार नहीं है।”
राज्य ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की उम्र अब लगभग 39 वर्ष हो चुकी है और इस आधार पर भी उसे नियुक्ति नहीं दी जानी चाहिए।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उसने अपने पिता की मृत्यु के तुरंत बाद नियमों के अनुसार आवेदन कर दिया था।
उसकी ओर से यह भी तर्क दिया गया कि
“माता-पिता के बीच तलाक होने से बेटे का अपने पिता से संबंध समाप्त नहीं होता और न ही वह आश्रित की श्रेणी से बाहर हो जाता है।”
इसके समर्थन में राजस्थान करुणामूलक नियुक्ति नियम, 1996 का हवाला दिया गया, जिसमें “आश्रित” की परिभाषा में बेटे को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
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अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
खंडपीठ ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि “आश्रित” की परिभाषा में मृत सरकारी कर्मचारी का बेटा स्पष्ट रूप से शामिल है।
अदालत ने कहा,
“सिर्फ इसलिए कि माता-पिता के बीच तलाक हो गया था, इससे यह तथ्य खत्म नहीं हो जाता कि याचिकाकर्ता मृत कर्मचारी का पुत्र है।”
अदालत ने यह भी कहा कि बेटे से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र मांगना मामले की परिस्थितियों में बिल्कुल अनुचित था।
दूसरी पत्नी की नियुक्ति पर अदालत की राय
मामले में राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि मृत कर्मचारी की दूसरी पत्नी को नौकरी मिल चुकी है।
इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि दूसरी पत्नी को विधवा कोटे के तहत नियमित नियुक्ति दी गई थी और इससे बेटे के स्वतंत्र अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता।
देरी को लेकर अदालत की टिप्पणी
पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने पिता की मृत्यु के लगभग एक महीने के भीतर आवेदन कर दिया था और उस समय वह पात्र आयु सीमा में था।
अदालत ने कहा कि
“प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी और अदालत में मुकदमे की लंबी अवधि का दोष याचिकाकर्ता पर नहीं डाला जा सकता।”
अदालत का निर्णय
इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।
अदालत ने राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को करुणामूलक नियुक्ति से वंचित करने के लिए दिए गए कारण टिकाऊ नहीं हैं।
इसके साथ ही अदालत ने राज्य की अपील खारिज कर दी और लंबित सभी आवेदन भी निस्तारित कर दिए।
Case Title: State of Rajasthan through the Chief Engineer vs Ashish Saxena & Others
Case No.: D.B. Special Appeal (Writ) No. 640/2018
Decision Date: 25 February 2026










